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कहानी का शीर्षक: अंधविश्वास | Title of the Story: Andhvishwas एक

कहानी का शीर्षक: अंधविश्वास | Title of the Story: Andhvishwas

एक छोटी सी गांव की एक महिला ने एक नाकारा बच्चे को अपने पास रखा था जो उसे बेहद प्यारा लगता था। लेकिन गांव के नामवर ज्योतिषी ने उसे बताया कि बच्चा अंधा होगा। महिला डर गई और उसे नीचे के बच्चों के साथ खेलने के लिए भेज दिया, सोचती थी कि उसे अंधापन से बचा जा सकता है।

पारिवारिक विवादों के बीच, जब वह अंधे बच्चे को पास में नहीं देखती थी, वह उसे धोखा देने के लिए प्रि‍यंका कामान को बच्चे के साथ छोड़ देती थी। बच्चा अभी तक भोजन के लिए कुछ मांगता नहीं था लेकिन उसे इस तरह छोड़ देने से उसे बहुत दुख हुआ।

बच्चे को उसके अंधापन की वजह से खेल की डहर में नहीं लगाया जाता था, और वह विभिन्न तरह के अंधविश्वासों के साथ जीतता रहा। यह चला गया कि वह बहुत खतरनाक है और लोग उसे देखना चाहते थे। हालांकि, एक दिन एक महिला उस छोटे से बच्चे को देखती है जो धूल रेत के ताले और सफेद जूते उसे कुछ नहीं करवा रहे हैं।

धीरे-धीरे, वह महिला बच्चे के पूछताछ करने लगती है। बच्चा आखिरी दौर में थक जाता है और उससे बोलता है, “मुझे चला जाने दो। मैं सचमुच में यहाँ से भागना चाहता हूँ।”

“लेकिन तुम कहाँ जाओगे?” महिला ने पूछा।

“मैं उस जगह जाऊंगा जहाँ सब लोग मुझे घृणा करने के बजाय प्यार से मिलते हैं,” बच्चा उत्तर देता है।

महिला बच्चे के साथ चलती है और जब वह गांव के बाहर आती है तो वह देखती है कि उस छोटे से बच्चे के चारों ओर कुछ लोग खड़े हैं और उसपर हंस रहे हैं। नाराज होकर, महिला बच्चे से बोलती है, “तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्या लोग कहते हैं। नहीं किसी ने प्यार नहीं किया है।”

बच्चा वहीं खड़ा रह जाता है। उस परिवार को ढूँढते हुए, बच्चे उस बस्ती में जा पहुंचता है जहाँ सब लोग प्रसन्नता से उसके साथ खेलने लगे हैं। वहाँ उसने एक सुंदर बालिका के साथ मिली अंतिम लम्हों में जो उसे दोबारा दुनिया को देखने के लिए प्रेरित करती है।

बच्चे बचपन से ही अंधा होता है और इस तस्वीर का मतलब है कि जब हम अंधविश्वास की तलाश में होते हैं, तब हम अपने आप को सच्चाई से वसूलने के लिए बहुत समय बिताते हैं। लेकिन जब हम अपने अंधविश्वासों को छोड़कर सच्चाई से मुक्त होते हैं, तब हम नैतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता का आनंद उठाते हैं।

Story Title: Andhvishwas | कहानी का शीर्षक: अंधविश्वास

कागा जी

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