डिग्री मिले न मिले, ‘नेतागिरी’ की गारंटी: छात्र आंदोलनों की असली इनसाइड स्टोरी!

नमस्कार दर्शकों! ‘काक-वाणी’ में आपका स्वागत है। आज हम बात करेंगे उस विषय पर जिसे ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका ने बेहद संजीदगी से “आक्रोश और उम्मीद की राजनीति” कहा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं भारत के छात्र आंदोलनों की।… Continue Reading →

असली ‘मूल निवासी’ की खोज: जब सरकारी फाइलें तय करती हैं कि आप धरतीपुत्र हैं या केवल पर्यटक!

वाह! क्या गजब की बहस छिड़ी है। ‘द डिप्लोमैट’ अखबार ने आखिरकार उस दुखती रग पर हाथ रख दिया है, जिसे हमारे दोनों देशों के राजनेता सालों से सहला रहे हैं। मुद्दा यह है कि आखिर ‘मूल निवासी’ (Indigenous) कौन… Continue Reading →

हैफा की लड़ाई और याददाश्त का मोतियाबिंद: जब सौ साल पुराने घोड़ों पर सवार होकर आती है राष्ट्रभक्ति

वाह रे हमारी याददाश्त! वैसे तो हमें पिछले चुनाव में किए गए वादे याद नहीं रहते और न ही यह याद रहता है कि पिछले साल किस आपदा में कितने लोग बेघर हुए थे। लेकिन जब बात सौ साल पुरानी… Continue Reading →

बहुपक्षवाद का ‘त्रिशूल’: जब बिल्ली, चूहा और नेवला मिलकर लगे ‘शाकाहार’ का उपदेश देने!

वाह! क्या विहंगम दृश्य है। ग्लोबल कूटनीति के रंगमंच पर एक ऐसा नाटक मंचित हो रहा है, जिसे देखकर शेक्सपियर भी अपनी कब्र में लोट-पोट हो जाएं। खबर आई है कि भारत, कनाडा और यूरोपीय संघ (EU) ने मिलकर ‘बहुपक्षवाद’… Continue Reading →

‘विश्वगुरु’ का नया टॉनिक: V4 देशों के साथ ‘गहरे’ रिश्तों का कूटनीतिक तमाशा

वाह! कूटनीति हो तो ऐसी हो, वरना न हो। हमारे माननीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर साहब ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब देश के भीतर के मुद्दे बोरिंग होने लगें, तो सुदूर यूरोप के नक्शे से… Continue Reading →

लिबरल छाते के नीचे सेक्युलर बुद्धिजीवी: जब ‘कौम’ को बचाने के लिए मिला नया नुस्खा!

स्वागत है आपका ‘काक-वाणी’ के विशेष बौद्धिक सर्कस में! हाल ही में अंग्रेजी पत्रकारिता के मसीहा ‘द प्रिंट’ ने एक ऐसा ज्ञान का मोती उगला है, जिसे पढ़कर हमारी कौवे जैसी तीक्ष्ण बुद्धि भी चकरा गई है। उनका कहना है… Continue Reading →

जहर की घूंट और सियासत के घूंट: पंजाब के नेताओं का नया ‘एनर्जी ड्रिंक’

वाह रे हमारी भारतीय राजनीति! यहाँ मौत भी एक तमाशा है और खुदकुशी भी एक सुनहरा चुनावी अवसर। पंजाब में एक मजबूर शख्स ने जहर क्या खाया, मानों नेताओं के सूखे पड़े बयानों के बागों में बहार आ गई। अब… Continue Reading →

चुनाव चिह्न की जंग: जब ‘घास-फूस’ ही बन जाए जीवन का आधार!

भारतीय राजनीति के रंगमंच पर आपका स्वागत है, जहां ‘काम’ से ज्यादा ‘चमचमाते निशान’ की कीमत होती है। ताजा मामला हमारी प्रिय दीदी की पार्टी, यानी तृणमूल कांग्रेस का है। ‘डेक्कन हेराल्ड’ की खबर ने लोकतंत्र के उस सबसे बड़े… Continue Reading →

खोखले बांसों का मधुर संगीत और हमारा ‘ठोस’ लोकतंत्र

वाह! क्या खोजी पत्रकारिता है। ‘स्क्रॉल’ महोदय ने एक महान वैश्विक रहस्योद्घाटन किया है कि भारत के खोखले राजनीतिक दल एक ठोस लोकतंत्र का निर्माण नहीं कर सकते। इस अद्भुत और क्रांतिकारी खोज के लिए उन्हें पत्रकारिता का नोबेल पुरस्कार… Continue Reading →

सत्ता तो आनी-जानी है, पर व्हाट्सएप फॉरवर्ड अमर रहेगा!

स्वराज्य पत्रिका ने अपने एक लेख से दक्षिणपंथी विचारकों के ‘राष्ट्रवादी’ चश्मे पर ऐसी धूल झोंकी है कि बेचारे अब तक आंखें मल रहे हैं। लेख का रोना यह है कि हमारे दक्षिणपंथी भाइयों ने पिछले दस सालों में सत्ता… Continue Reading →