Title: विश्वास का मतलब
एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में रहने वाला बच्चा नाम सुनील था। सुनील बहुत ही अच्छा बच्चा था, जो हमेशा मेहनत करता था और किसी का भला करना चाहता था। उसकी माँ ने उसे शुरू से ही ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और विश्वास पर ध्यान दिया था। सुनील ने माँ के बताये गए सिद्धांतों को हमेशा अपने जीवन में लागू किया था।
एक दिन, सुनील को अपने दोस्त रोहन ने बताया कि उसने एक नयी खिलौने की दुकान देखी है जो बहुत ही महंगा है। सुनील को उस खिलौने की बहुत चाह हुई। उसने अपनी माँ से निवेदन किया कि क्या वह उस खिलौने को खरीद सकता है।
मां ने सुनील से पूछा – “तू स्कूल जाता है ना, तुझे पता नहीं है कि हम गरीब हैं। हमें उस खिलौने के पैसे नहीं हैं।”
इस पर सुनील चुप रह गया। लेकिन वह खिलौना लेने के लिए बेहद उत्सुक था। फिर उसने सोचा कि शायद वह स्कूल में अपने दोस्तों से पैसे उधार ले सकता है।
जब सुनील पैसे उधार नहीं ले पाया तो उसने खिलौने खरीदने से इनकार कर दिया। यह सुनील के दोस्त रोहन को बहुत ही खुश नहीं किया। रोहन ने सुनील से बोला – “तू नापसंदीदा हो, तेरे पास पैसे नहीं होते तो इसका मतलब नहीं कि तू खिलौने को नहीं खरीद सकता है।”
सुनील को यह समझ में नहीं आया कि उसका दोस्त उसे ऐसा क्यूँ समझा रहा है। उसने अपने बाप से बताया कि उसका दोस्त उसे बुरा समझ रहा है।
उसके बाप ने उसे एक कहानी सुनाई – “एक दिन एक शेर एक झुग्गी के पास से गुजर रहा था। झुग्गी वाले ने शेर को देखा तो उसने सोचा कि शेर मुझे जरूर खा जाएगा। लेकिन शेर उससे चुपचाप से गुजर गया। फिर उसी दिन कुछ लोग झुग्गी वाले को बताने आ गए कि घाट पार करते समय उन्होंने देखा था कि एक भेड़िया उस साथी शेर को देखता हुआ भाग जाता है। जब झुग्गी वाले ने उससे पूछा कि तुम क्यूँ नहीं भागे, तो भेड़िया ने कहा कि शेर मुझे खा जायेगा, ये मेरा विश्वास है।”
उसके बाप ने कहा – “देख बेटा, विश्वास बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। विश्वास से हमें मौके मिलते हैं और हम कामयाब होते हैं। इसलिए, तुम अपने दोस्त का विश्वास नहीं खोना चाहिए।”
सुनील ने अपने दोस्त का विश्वास जीता और उसने उस खिलौने को खरीद लिया। अब वह खुश था, क्योंकि उसने अपने दोस्त के विश्वास को जीत लिया था। सुनील को आज पता था कि विश्वास का मतलब क्या है और वह इसे कैसे जीत सकता है।
समाप्ति