बॉलीवुड के ‘सिंघम’ यानी अजय देवगन अपनी दमदार एक्टिंग के साथ-साथ अपनी बेबाकी के लिए भी जाने जाते हैं। हाल ही में फिक्की फ्रेम्स (FICCI Frames) के मंच पर अजय देवगन ने कुछ ऐसा कह दिया है, जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री में हलचल मचा दी है। अजय का मानना है कि हिंदी फिल्म बनाना रीजनल (क्षेत्रीय) या इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) सिनेमा से कहीं ज्यादा मुश्किल काम है। क्यों? क्योंकि भैया, यहां ऑडियंस का मूड समझना मौसम विभाग के अनुमान से भी ज्यादा कठिन है!
क्यों मुश्किल है हिंदी फिल्म बनाना? अजय देवगन ने खोला राज
फिक्की फ्रेम्स के दौरान बातचीत करते हुए अजय देवगन ने बॉलीवुड के डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स का दर्द बयां किया। उन्होंने कहा, “जब आप एक रीजनल फिल्म बनाते हैं, तो आपको पता होता है कि आपका टारगेट ऑडियंस कौन है। साउथ के मेकर्स को अपनी संस्कृति और दर्शकों की पसंद की सटीक समझ होती है। लेकिन हिंदी फिल्मों के साथ ऐसा नहीं है।” अजय के मुताबिक, हिंदी सिनेमा का कैनवास इतना बड़ा है कि यहां हर 100 किलोमीटर पर दर्शकों की पसंद बदल जाती है और आप कभी नहीं जान पाते कि आपका असली टारगेट ऑडियंस कौन है।
‘एक देश, अनेक स्वाद’ – बॉलीवुड की असली चुनौती
अजय देवगन ने बिलकुल पते की बात कही है। हिंदी फिल्मों के दर्शकों में मुंबई-दिल्ली के मल्टीप्लेक्स वाले मॉडर्न दर्शक भी हैं, तो यूपी-बिहार के सिंगल स्क्रीन वाले ‘सीटीमार’ फैंस भी। अब एक ही फिल्म में इन दोनों को खुश करना लोहे के चने चबाने जैसा है। हॉलीवुड फिल्मों का अपना एक सेट पैटर्न और दर्शक वर्ग होता है, लेकिन बॉलीवुड में आपको ‘दृश्यम’ जैसी सस्पेंस थ्रिलर भी बनानी है और ‘गोलमाल’ जैसी मसाला कॉमेडी भी, ताकि हर वर्ग के दर्शक को संतुष्ट किया जा सके।
क्या काक-वाणी का भी यही मानना है?
अजय देवगन की इस बात में दम तो है। आजकल बॉलीवुड जब रीमेक और घिसे-पिटे फॉर्मूले से जूझ रहा है, ऐसे में दर्शकों की नब्ज पकड़ना वाकई टेढ़ी खीर हो गया है। वैसे, अजय जी, आपकी आने वाली फिल्मों से ‘काक-वाणी’ और दर्शकों को बड़ी उम्मीदें हैं। अब देखना यह है कि भूल-भुलैया जैसी इस हिंदी ऑडियंस को आप अपनी अगली फिल्म से कैसे थियेटरों तक खींच पाते हैं। तो दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि बॉलीवुड के लिए फिल्में बनाना सबसे टेढ़ा काम है? हमें जरूर बताएं!
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