वाह! अल जजीरा ने भी क्या गंभीर सवाल उठाया है। भारत और बांग्लादेश के रिश्ते आज उस मोड़ पर आ खड़े हुए हैं जहां ‘हसीना’ ही सबसे बड़ा गतिरोध बन गई हैं। ढाका में बैठे नए कर्ता-धर्ता नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस साहब रोज सुबह उठकर पहला काम यही करते हैं—दूरबीन लगाकर दिल्ली की तरफ देखना और चिल्लाना, “हसीना को वापस करो!” उधर, भारत ‘अतिथि देवो भव:’ के सनातन सिद्धांत को सीने से चिपकाए बैठा है, मानो हसीना जी कोई दूर की मौसी हैं जो गर्मियों की छुट्टियों में बिना बताए आ गई हैं और अब वापस जाने का नाम नहीं ले रहीं।
हसीना जी का ‘लॉन्ग वेकेशन’ और ढाका का बढ़ा हुआ बीपी
ढाका की अंतरिम सरकार को लगता है कि जब तक शेख हसीना भारत में सुरक्षित बैठकर ‘लुटियन दिल्ली’ की ताजी हवा खा रही हैं, तब तक उनकी ‘क्रांति’ अधूरी है। वे चाहते हैं कि भारत तुरंत हसीना जी को एक कूरियर पार्सल में पैक करे और ढाका के पते पर भेज दे। लेकिन कूटनीति इतनी आसान कहां होती है? भारत के लिए यह ‘धर्मसंकट’ है। अगर हसीना को वापस भेजा, तो दुनिया कहेगी कि भारत अपने पुराने और वफादार दोस्तों को मुसीबत में मझधार में छोड़ देता है। और अगर नहीं भेजा, तो नया पड़ोसी मुंह फुलाकर सीधे चीन की गोद में बैठ जाएगा, जो पहले से ही वहां बड़ी सी गोद फैलाए इंतजार कर रहा है।
आखिर कैसे टूटेगा यह गतिरोध?
‘काक-वाणी’ के विशेष कूटनीतिक सूत्रों (जो अक्सर चाय की टपरियों पर पाए जाते हैं) के पास इस गतिरोध को तोड़ने के कुछ बेहद व्यावहारिक और मजेदार सुझाव हैं।
पहला समाधान तो यह हो सकता है कि भारत और बांग्लादेश के बीच एक ‘फ्रेंडली क्रिकेट मैच’ कराया जाए। जो जीतेगा, हसीना उसकी! अगर बांग्लादेश जीता तो हसीना वापस, और अगर भारत जीता तो बांग्लादेश को भारत से मिलने वाली मुफ्त बिजली और प्याज के बदले हसीना जी के ‘शरणार्थी भत्ते’ का आधा खर्च उठाना होगा।
दूसरा समाधान है ‘वर्क फ्रॉम होम’ मॉडल। हसीना जी भारत में ही रहें, लेकिन ढाका की अदालतों में वीडियो कॉल के जरिए पेश होती रहें। वे जूम कॉल पर जजों को ढाका की बिरयानी की याद दिलाएं और जज साहिबान दिल्ली के गोलगप्पों को देखकर लार टपकाएं। बातचीत से ही तो रास्ता निकलता है!
‘काक-वाणी’ का आखिरी ज्ञान
सच्चाई तो यह है कि कूटनीति के इस शतरंज में दोनों तरफ के खिलाड़ी केवल मोहरे चल रहे हैं। जब तक बांग्लादेश को यह समझ नहीं आता कि केवल ‘हसीना-हसीना’ जपने से देश की महंगाई कम नहीं होगी, और भारत को यह समझ नहीं आता कि पुराने दोस्तों का बोझ कब तक ढोना है, तब तक यह गतिरोध ऐसे ही मखमली सोफे पर बैठकर चाय की चुस्कियां लेता रहेगा। तब तक अल जजीरा हेडलाइन बनाता रहे और हम कौवे की तरह कांव-कांव करते रहें!
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