नमस्कार दर्शकों! ‘काक-वाणी’ में आपका स्वागत है। जब-जब हमें लगता है कि भारतीय राजनीति के सारे रंग फीके पड़ चुके हैं और कुछ नया सुनने को नहीं मिलेगा, तब-तब सात समंदर पार बैठा कोई अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस हमारे लिए मनोरंजन का नया पिटारा खोल देता है। इस बार यह उपकार कतर के ‘अल-जज़ीरा’ ने किया है। उनके एक बेहद क्रांतिकारी विश्लेषण का शीर्षक है—”क्या भारत का ‘कॉकरोच’ आंदोलन मोदी के चुनाव प्रमुख को उखाड़ फेंकेगा?” वाह! क्या उपमा है। कसम से, डार्विन भी स्वर्ग से यह देखकर रो रहे होंगे कि उनके विकासवाद का सिद्धांत अंततः भारत के तिलचट्टों पर आकर रुक गया है। अब तक तो हम ‘दीमक’ और ‘परजीवी’ जैसे देसी विशेषणों से ही काम चला रहे थे, लेकिन अल-जज़ीरा ने सीधे जीव विज्ञान की नई इंटरनेशनल डिक्शनरी ही खोल दी है।
वैश्विक मीडिया की ‘माइक्रोस्कोपिक’ नजर और भारतीय तिलचट्टे
दोहा के वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर भारतीय लोकतंत्र की नब्ज टटोलने वाले विश्लेषकों की दाद देनी होगी। वे भारत में बेरोजगारी, गरीबी या महंगाई नहीं ढूंढते; वे सीधे नालियों और रसोई के कोनों से ‘कॉकरोच’ ढूंढ निकालते हैं। वैसे, वैज्ञानिक रूप से कॉकरोच की एक महान खूबी है—ये परमाणु हमले में भी जिंदा बच सकते हैं। शायद अल-जज़ीरा का इशारा इसी तरफ है कि भारतीय विपक्ष और एक्टिविस्ट भी सत्ता के तमाम ‘चुनावी कीटनाशकों’ के छिड़काव के बावजूद रेंगते हुए बचे रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये डैने फड़फड़ाने वाले छोटे जीव चुनाव आयोग के मजबूत मुख्य द्वार को लांघ पाएंगे? या फिर सिर्फ उड़कर गृहणियों को डराने तक ही सीमित रहेंगे?
चुनाव प्रमुख की कुर्सी और कॉकरोच का ‘हिट’ स्प्रे
मोदी जी के ‘चुनाव प्रमुख’ यानी हमारे मुख्य चुनाव आयुक्त भी कम कमाल के नहीं हैं। वे एक ऐसी अभेद्य दीवार की तरह खड़े हैं, जिस पर विपक्ष के सारे आरोपों के स्प्रे बेअसर साबित होते हैं। विपक्ष चिल्लाता रहता है कि ईवीएम में गड़बड़ी है, वीवीपैट की पर्चियां गिनो, पर चुनाव प्रमुख साहब अपनी मंद मुस्कान के साथ ‘सब चंगा सी’ का बोर्ड टांग देते हैं। सोचिए, एक तरफ सत्ता का सरकारी ‘लक्ष्मण रेखा’ वाला ‘हिट’ स्प्रे है और दूसरी तरफ ये ढीठ तिलचट्टे, जो हर चुनाव हारने के बाद फिर से बाहर निकल आते हैं। अल-जज़ीरा को लगता है कि ये कथित ‘कॉकरोच’ क्रांतिकारी अपनी मूंछें हिलाकर इस विशालकाय सरकारी तंत्र को हिला देंगे। वाकई, खयाली पुलाव में अब विदेशी मसालों का तड़का लग चुका है।
‘काक-वाणी’ का अंतिम ज्ञान
सच तो यह है कि जब जमीन पर आंदोलन थका-थका महसूस करने लगे, तो विदेशी मीडिया के ऐसे भारी-भरकम और अजीबोगरीब शब्द ही बौद्धिक ऑक्सीजन का काम करते हैं। कल को कोई इन्हें ‘दीमक’ कहेगा, तो कोई ‘टिड्डी दल’। लेकिन ‘काक-वाणी’ का स्पष्ट मानना है कि जब तक भारतीय जनता खुद ईवीएम का बटन दबाकर बदलाव नहीं लाती, तब तक अल-जज़ीरा चाहे जितने भी कॉकरोचों को ट्रेनिंग दे ले, चुनाव प्रमुख की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति सिर्फ मुस्कुराएगा और कहेगा—”अगली बार, फिर से यही सरकार!”
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