अहंकार की पराजय: जीवन का सच बताने वाली लोककथा

बहुत समय पहले की बात है, एक शांत और सुंदर गाँव में देवदत्त नाम का एक मूर्तिकार रहता था। देवदत्त मिट्टी और पत्थरों में ऐसे प्राण फूंकता था कि देखने वाले बस देखते ही रह जाते थे। उसकी बनाई मूर्तियाँ इतनी जीवंत होती थीं कि मानो वे अभी बोल पड़ेंगी। दूर-दूर के राज्यों से लोग उसकी कला की सराहना करने आते थे। इस प्रशंसा ने धीरे-धीरे देवदत्त के मन में एक गहरा अहंकार भर दिया। वह खुद को अमर समझने लगा और यह भूल गया कि इस संसार में जो आया है, उसे एक दिन जाना ही है।

जब यमदूत द्वार पर आए

समय अपनी गति से चलता रहा और देवदत्त बूढ़ा होने लगा। एक रात, उसे एक स्वप्न में आभास हुआ कि उसकी आयु अब समाप्त होने वाली है और अगले ही दिन यमदूत उसके प्राण हरने के लिए आने वाले हैं। मृत्यु के भय ने देवदत्त को पूरी तरह से घेर लिया। वह मरना नहीं चाहता था। अपनी कला के बल पर उसने मौत को मात देने की एक योजना बनाई।

देवदत्त ने बिना पलक झपकाए पूरी रात काम किया और अपनी हूबहू दिखने वाली दस सजीव मूर्तियाँ तैयार कीं। सुबह जब यमदूत के आने का समय हुआ, तो वह उन मूर्तियों के बीच में बिल्कुल मौन और सांस रोककर खड़ा हो गया। जब यमदूत कमरे में दाखिल हुए, तो वे हैरान रह गए। वहाँ एक जैसे दिखने वाले ग्यारह देवदत्त खड़े थे। यमदूत के लिए असली इंसान को पहचानना असंभव हो गया था।

अहंकार की एक छोटी सी दरार

यमदूत जानते थे कि प्रकृति के नियम के अनुसार देवदत्त के प्राण ले जाना अनिवार्य है, लेकिन वे किसी निर्जीव मूर्ति पर अपना फंदा नहीं डाल सकते थे। कुछ देर सोचने के बाद, यमदूत को मानव स्वभाव और विशेषकर एक कलाकार के मनोविज्ञान का ध्यान आया। वे समझ गए कि देवदत्त को केवल उसके अहंकार के जरिए ही पकड़ा जा सकता है।

यमदूत ने गहरे दुःख का नाटक किया और बोले, “अद्भुत! अविश्वसनीय! बनाने वाले ने वास्तव में कमाल कर दिया है। इन मूर्तियों को देखकर तो स्वयं विधाता भी चकित रह जाएं। लेकिन अफसोस, इतनी सुंदर और सजीव मूर्तियों में एक बहुत बड़ी त्रुटि रह गई है। यदि मूर्तिकार मेरे सामने होता, तो मैं उसे उसकी यह बड़ी भूल जरूर बताता।”

अपने काम में कोई कमी या खोट सुनना देवदत्त के लिए असहनीय था। उसका कलाकार स्वभाव और बरसों का अहंकार जाग उठा। वह भूल गया कि वह अपनी जान बचाने के लिए वहाँ छिपा था। वह तुरंत मूर्तियों के बीच से चिल्लाते हुए बाहर आया, “असंभव! मेरी कला बिल्कुल त्रुटिहीन है। बताओ, भला मेरी बनाई मूर्तियों में क्या कमी है?”

यमदूत मुस्कुराए, उन्होंने तुरंत देवदत्त का हाथ पकड़ लिया और अत्यंत शांत स्वर में बोले, “बस यही एक कमी है देवदत्त! तुम्हारी बनाई मूर्तियाँ बोलती नहीं हैं, लेकिन तुम्हारा अहंकार बोल उठा।” देवदत्त निरुत्तर हो गया। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे, पर अब बहुत देर हो चुकी थी।

कहानी की सीख: जीवन का परम सच

यह लोककथा हमें जीवन का सच सिखाती है कि मृत्यु इस संसार का सबसे बड़ा और अटल नियम है। मनुष्य चाहे कितना भी प्रतिभाशाली, धनवान या शक्तिशाली क्यों न हो जाए, वह अपनी नियति को बदल नहीं सकता। हमारा अहंकार ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है, जो हमारी बुद्धि को हर लेता है और हमारे पतन का कारण बनता है। इसलिए, जीवन में अपनी कला और उपलब्धियों पर गर्व करना अच्छा है, लेकिन अहंकार से हमेशा दूर रहना चाहिए।

कागा जी