ईरानी शांतिदूत का भारतीय ‘योग’: जब बारूद के सौदागर ने भारत से मांगी शांति की जड़ी-बूटी!

वाह! क्या गजब का दौर आ गया है। मिडिल ईस्ट में दिन-रात बारूद की खेती करने वाले अब शांति की फसल काटने के लिए भारत की ओर हसरत भरी निगाहों से देख रहे हैं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने भारत से गुहार लगाई है कि भाई, हमारे इलाके में थोड़ी ‘शांति’ की हवा चला दो। अब इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की पराकाष्ठा कहें या फिर शुद्ध कॉमेडी, यह समझ से परे है। ऐसा लगता है कि पेज़ेश्कियान साहब को यह गलतफहमी हो गई है कि भारत के पास कोई ऐसी जादुई छड़ी है, जिसे घुमाते ही हमास, हिजबुल्लाह और इजरायल आपस में गले मिलकर भजन गाने लगेंगे।

विश्वगुरु की ‘शांति थेरेपी’ और ईरानी उम्मीदें

ईरान का यह सोचना कि भारत मध्य पूर्व में शांति लाएगा, वैसा ही है जैसे कोई अपने घर की आग बुझाने के लिए उस व्यक्ति को बुलाए जो खुद अपने ही घर के बजट को संभालने में व्यस्त है। भारत पहले से ही अपने प्यारे पड़ोसियों—चीन और पाकिस्तान—के साथ ऐसी ‘शांति’ का आनंद ले रहा है कि सीमाओं पर कभी बोरियत महसूस ही नहीं होती। ऊपर से हमारे देश के अंदर चुनावी रैलियों में होने वाली शाब्दिक गोलाबारी इतनी शांतमयी होती है कि संयुक्त राष्ट्र को भी हमसे ट्यूशन लेना चाहिए। ऐसे में ईरानी राष्ट्रपति का यह सोचना लाजिमी है कि जो देश अपने यहां ‘शांतिपूर्वक’ इतनी अशांति झेल सकता है, वह उनके रॉकेटों को तो चुटकियों में ठंडा कर देगा।

क्या भारत भेजेगा अपनी न्यूज़ डिबेट और योग गुरुओं को?

अब सवाल यह उठता है कि भारत इस क्षेत्रीय शांति में क्या योगदान दे सकता है? ‘काक-वाणी’ के पास इसके लिए कुछ बेहद सस्ते और टिकाऊ सुझाव हैं। पहला, भारत को चाहिए कि वह अपने कुछ ‘तेज-तर्रार’ न्यूज़ एंकरों को तेहरान और यरूशलेम भेज दे। वे वहां के नेताओं को अपने प्राइम-टाइम शो पर बिठाकर इतना चिल्लाएंगे कि दोनों पक्ष बहरे हो जाएंगे। जब कोई किसी की बात सुन ही नहीं पाएगा, तो युद्ध खुद-ब-खुद रुक जाएगा। दूसरा विकल्प यह है कि वहां योग शिविर लगा दिए जाएं। कल्पना कीजिए, नेतन्याहू और पेज़ेश्कियान आमने-सामने बैठकर अनुलोम-विलोम कर रहे हैं—सांस अंदर, शांति अंदर; सांस बाहर, मिसाइल बाहर!

खैर, कूटनीति के इस मंच पर यह बयान केवल अखबारों के पन्ने भरने और चाय की चुस्कियों के साथ हंसने के लिए बेहतरीन है। ईरान को भी पता है और भारत को भी, कि असली शांति तब तक नहीं आ सकती जब तक हथियारों की दुकानें चलाने वाले सुपरपावर इसे न चाहें। लेकिन तब तक के लिए, पेज़ेश्कियान साहब की इस भोली गुहार पर हम सिर्फ यही कह सकते हैं—’अतिथि देवो भव’, पर प्रभु, हमारे यहां पहले से ही बहुत ‘शांति’ है, कृपया अपनी अशांति खुद ही संभालें!


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कागा जी