वाह! क्या दिन आ गए हैं। जब पूरी दुनिया बारूद के ढेर पर बैठकर माचिस ढूंढ रही है, तब ईरान के नए नवेले राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान को अचानक भारत की याद आई है। उन्होंने हमारे देश से गुहार लगाई है कि ‘हे विश्वगुरु, जरा हमारे क्षेत्र (मिडिल ईस्ट) में भी शांति का छिड़काव कर दो।’ अब इसे ईरान की गहरी समझदारी कहें या उनका हताश प्रयास, लेकिन ‘काक-वाणी’ को इस खबर में कॉमेडी का फुल डोज नजर आ रहा है।
ईरान की ‘शांति’ और जलता हुआ चूल्हा
ईरान और शांति? यह सुनने में वैसा ही लगता है जैसे कोई शिकारी शेर अचानक शाकाहार और अहिंसा पर प्रवचन देने लगे। एक तरफ यमन के हूती, लेबनान के हिजबुल्लाह और गाजा के हमास को वैचारिक और आर्थिक ‘आशीर्वाद’ देने का श्रेय ईरान को जाता है, और दूसरी तरफ पेज़ेशकियान साहब चाहते हैं कि भारत आए और उनके फैलाए हुए रायते को समेटे। वैसे, भारत को यह निमंत्रण देकर उन्होंने साबित कर दिया है कि जब खुद के घर में आग लगी हो, तो पड़ोसी के कुएं का पानी ही सबसे मीठा लगता है। शायद ईरान को लगता है कि भारत के पास कोई ऐसा ‘जादुई मंत्र’ है जिससे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू रातों-रात सुधर जाएंगे और ईरान को ‘शांति दूत’ का नोबेल पुरस्कार मिल जाएगा।
विश्वगुरु का ‘डिप्लोमैटिक’ धर्मसंकट
अब हमारे प्यारे भारत की स्थिति देखिए। हम पहले से ही अपनी सीमाओं पर चीन की चालबाजी और पाकिस्तान की नापाक हरकतों से निपटने में व्यस्त हैं। घरेलू स्तर पर चुनावों के शोर, महंगाई और राजनीतिक तूफानों से फुर्सत मिले तब तो कोई वैश्विक शांति दूत बने। ऐसे में ईरान की यह मांग हमारे कूटनीतिज्ञों के लिए किसी सिरदर्द से कम नहीं है। भारत पहले से ही रूस-यूक्रेन युद्ध में शांति के प्रवचन दे-देकर थक चुका है, और अब हमें मिडिल ईस्ट का क्लेम सुलझाने का ठेका दिया जा रहा है। अगर भारत इस शांति मिशन पर आगे बढ़ता है, तो अमेरिका और इजरायल अपनी भौहें टेढ़ी कर लेंगे, और अगर मना करता है, तो ईरान का दिल टूट जाएगा, जिससे चाबहार बंदरगाह के हमारे सपने पर धूल जम सकती है।
क्या योग और कूटनीति से थमेगा बारूद?
कुल मिलाकर, पेज़ेशकियान साहब की यह अपील जितनी गंभीर दिखती है, उतनी ही हास्यास्पद भी है। क्या वे चाहते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री ईरान और इजरायल के बीच बैठकर दोनों को ‘अनुलोम-विलोम’ करवाएं? या फिर हमारे विदेश मंत्री एस. जयशंकर अपनी जादुई मुस्कान और कड़क बयानों से वहां उड़ती मिसाइलों का रुख मोड़ दें? कारण जो भी हो, काक-वाणी तो यही कहेगी कि ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’। ईरान पहले खुद के अंदर झांककर शांति ढूंढ ले, भारत तो अपनी ‘गुटनिरपेक्ष’ थाली में पहले से ही बहुत सारे संकट परोस कर बैठा है।
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