अरे वाह! द टाइम्स ऑफ इंडिया के महान विद्वानों ने अंततः देश की सबसे बड़ी समस्या को ढूंढ ही निकाला। खबर है कि कांग्रेस ‘पोस्ट-ट्रुथ’ राजनीति कर रही है, अविश्वास का उत्पादन कर रही है और हमारे अति-सुरक्षित, पूरी तरह निष्पक्ष लोकतंत्र की नींव हिला रही है। सुनिए और तालियां बजाइए! क्योंकि जब देश में सब कुछ एकदम सही, पारदर्शी और अमृत-तुल्य चल रहा हो, तो लोकतंत्र को खतरा केवल एक ही चीज़ से हो सकता है—विपक्ष की बातों से!
सत्य, असत्य और अविश्वास का कुटीर उद्योग
अब आप पूछेंगे कि यह ‘पोस्ट-ट्रुथ’ किस चिड़िया का नाम है? सरल भाषा में समझिए: जब सत्ता पक्ष कोई दावा करे या चुनावी डेटा पेश करे, तो वह ‘परम सत्य’ है। लेकिन जब विपक्ष उस पर सवाल उठाए या अपना कोई नैरेटिव गढ़े, तो वह ‘पोस्ट-ट्रुथ’ का खतरनाक विनिर्माण (manufacturing) बन जाता है।
अरे साहब, जरा सोचिए! जिस पार्टी से अपने चुनाव सही से नहीं लड़े जा रहे, वह पूरे देश के करोड़ों लोगों के दिमाग में ‘अविश्वास की फैक्ट्री’ चला रही है! क्या गजब की प्रतिभा है! काक-वाणी इस विश्वस्तरीय तकनीकी क्षमता को नमन करती है। अब अगर किसी नागरिक को संस्थाओं पर कोई संदेह होता है, तो उसका कारण महंगाई, बेरोजगारी या चुनावी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि राहुल गांधी का कोई भाषण है। कितना आसान और सुंदर स्पष्टीकरण है!
लोकतंत्र की रक्षा केवल सत्ता-समर्थित हेडलाइंस से होगी!
मुख्यधारा के मीडिया को इस बात की गहरी चिंता है कि लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। और इस लोकतंत्र को गिराने का मास्टरमाइंड कौन है? वही दल, जो पिछले एक दशक से हर चुनाव में संघर्ष कर रहा है। सचमुच, विपक्ष इतना दैवीय और शक्तिशाली है कि वह बिना सत्ता में रहे, बिना एजेंसियों के, सिर्फ बयानों से ही देश के सबसे मजबूत लोकतंत्र की नींव हिला सकता है!
हमारे बुद्धिजीवियों का मानना है कि संस्थाओं पर सवाल उठाना पाप है। ईवीएम हो या कोई संवैधानिक संस्था, उन पर भरोसा करना आपका राष्ट्रीय कर्तव्य है। अगर आप सवाल पूछते हैं, तो आप लोकतंत्र को मजबूत नहीं, बल्कि ‘अंडरमाइन’ कर रहे हैं।
तो हे देशवासियों, ‘काक-वाणी’ की सलाह मानिए और सावधान रहिए! अगली बार जब भी आपके मन में सरकार की किसी नीति पर संदेह पैदा हो, तो तुरंत अपने कान बंद कर लीजिए। समझ जाइए कि आपके दिमाग में कांग्रेस का ‘पोस्ट-ट्रुथ वायरस’ प्रवेश कर चुका है। सवाल मत पूछिए, टीवी देखकर ताली बजाइए और लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के लिए सारा दोष विपक्ष के सिर मढ़ते रहिए। आखिर आज के दौर में लोकतंत्र की सबसे सटीक परिभाषा यही तो है!
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