‘काक-वाणी’ विशेष: ‘द गार्जियन’ के पन्नों पर राजसी डर और शहादत का अंतरराष्ट्रीय राग!

वाह! क्या दर्द है, क्या शहादत की गाथा है! ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ के चमचमाते पन्नों पर जब भारत के सबसे बड़े ‘शाही घराने’ की बहू अपना दुखड़ा रोती हैं, तो लुटियंस दिल्ली के गमलों में खिले फूल भी सहम जाते हैं। सोनिया गांधी जी फरमाती हैं कि जब वे इस राजवंश में ब्याह कर आई थीं, तो उनके दिल में बस एक ही खौफ साए की तरह मंडराता रहता था—”अब अगला नंबर इनका (राजीव गांधी) है!”

विदेशी मीडिया और देसी राजवंश का ‘शाही’ मेलोड्रामा

अब आप ही बताइए, इतनी बड़ी भविष्यवाणी करने के लिए किसी महान ज्योतिषी की क्या जरूरत थी? जब राजनीति ही परिवार का इकलौता खानदानी व्यापार हो, तो जान का जोखिम तो उस ‘बिजनेस मॉडल’ की पहली शर्त होता है। लेकिन ‘काक-वाणी’ का सीधा सा सवाल है—जब खौफ इतना ही जानलेवा था, तो सत्ता के गलियारों में ऐसा कौन सा फेविकोल लगा था कि खौफ भी बना रहा और 10-जनपथ का मोह भी नहीं छूटा?

अंग्रेजी के नामचीन अखबार को दिए इस इंटरव्यू में वही पुरानी, पेटेंट कराई जा चुकी स्क्रिप्ट फिर से दोहराई गई है। पश्चिमी दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि यह परिवार राजनीति में अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि भारत की 140 करोड़ जनता पर अहसान करने के लिए उतरा था।

खौफ का कारोबार या कुर्सी का फेविकोल?

अगर डर वास्तव में इतना ही गहरा था, तो 2004 में ‘अंतरात्मा की आवाज’ का ड्रामा करके प्रधानमंत्री पद छोड़ते ही, पर्दे के पीछे रहकर ‘रिमोट कंट्रोल’ से सरकार चलाने की क्या मजबूरी थी? आज जब राहुल बाबा और प्रियंका जी उसी ‘खतरनाक’ राजनीति के अखाड़े में कुश्ती लड़ रहे हैं, तो सोनिया जी का वह पुराना खौफ अचानक ‘देश बचाने’ के महान जज्बे में कैसे तब्दील हो जाता है?

गोरे पत्रकारों को भी भारत के इस राजवंश का दुखड़ा छापने में असीम आनंद आता है। उन्हें लगता है कि भारत राजनीति का अखाड़ा नहीं, बल्कि शेक्सपियर का कोई खूनी नाटक है, जहां एक परिवार सिर्फ कुर्बानियां देने के लिए ही अवतरित हुआ है।

‘काक-वाणी’ का निष्पक्ष निष्कर्ष

राजनीति के बाजार में खौफ सिर्फ दो किस्म का होता है—पहला, जान जाने का डर; और दूसरा, चुनाव हारकर सत्ता गंवाने का डर। पहला डर इंसान को राजनीति की गंदगी से दूर ले जाता है, जबकि दूसरा डर इंसान को अपनी औलादों को जबरदस्ती राजनीति में धकेलने पर मजबूर करता है। अब सोनिया जी और उनके ‘द गार्जियन’ वाले पत्रकार साहब ही बैठकर तय कर लें कि 10-जनपथ को असल में किस बात का खौफ था!


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कागा जी