कॉकरोच क्रांति: जब रेंगते हुए जीवों ने हिला दिया माननीय मंत्री जी का सिंहासन!

क्रांति का नया प्रतीक: लाल सलाम नहीं, अब ‘कॉकरोच सलाम’!

भारतीय राजनीति में इतिहास गवाह है कि बड़े से बड़े घोटाले, जनता का हाहाकार और विपक्ष का शोर भी किसी मंत्री की कुर्सी को बाल बराबर नुकसान नहीं पहुंचा पाते। हमारे नेताओं की चमड़ी इतनी ‘बुलेटप्रूफ’ और संवेदनशीलतारहित होती है कि उस पर किसी भी नैतिक जिम्मेदारी का असर नहीं होता। लेकिन धन्य हो हमारे देश के छात्र नेता अभिजीत दिपके, जिन्होंने इस राजनीतिक अभेद्यता को तोड़ने के लिए एक ऐसा ‘बायोलॉजिकल वेपन’ खोज निकाला, जिसके सामने सत्ता की सारी हनक धरी की धरी रह गई। जी हां, हम बात कर रहे हैं – ‘कॉकरोच’ यानी तिलचट्टे की!

जब ‘पेस्ट कंट्रोल’ से भी काबू नहीं आई छात्र शक्ति

बीबीसी की सुर्खियां आज पूरी दुनिया में भारत का मान बढ़ा रही हैं कि कैसे एक छात्र के ‘कॉकरोच प्रदर्शन’ ने एक भारतीय मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। सोचिए, जो मंत्री जी विपक्ष के तीखे सवालों पर ठहाके लगाते थे, जो मीडिया के कैमरों को देखकर मुस्कुराते हुए अपनी बेगुनाही के बड़े-बड़े दावे करते थे, वे चंद रेंगने वाले लाल-भूरे जीवों के खौफ से ऐसे डरे कि सीधे इस्तीफा सौंप आए। यह हमारे महान लोकतंत्र की वह अभूतपूर्व जीत है, जिसे देखकर इतिहासकार भी अपनी कलम चबा रहे होंगे।

आमतौर पर भारतीय घरों में कॉकरोच दिखने पर लोग चप्पल उठा लेते हैं, लेकिन यहां तो पूरी की पूरी सरकार ही ‘पेस्ट कंट्रोल’ की मुद्रा में आ गई। अभिजीत दिपके ने यह साबित कर दिया कि व्यवस्था को सुधारने के लिए अब गांधीवादी तरीके से अनशन पर बैठने की कोई जरूरत नहीं है। बस सही जगह पर सही ‘कीड़े’ छोड़ने की जरूरत है। सरकारी हॉस्टलों और कैंटीनों के खराब खाने में मिलने वाले इन कॉकरोच ने वह कर दिखाया जो देश की बड़ी-बड़ी जांच एजेंसियां सालों की चार्जशीट में नहीं कर पातीं।

भविष्य के आंदोलनों का नया ‘मैनुअल’

‘काक-वाणी’ इस ऐतिहासिक सफलता पर अभिजीत दिपके और उनके आंदोलनकारी तिलचट्टों को कोटि-कोटि नमन करती है। अब समय आ गया है कि देश के अन्य आंदोलनों को भी इस सफल मॉडल से सीख लेनी चाहिए। बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों को अब सड़कों पर धूप में खड़े होकर लाठियां खाने की कोई जरूरत नहीं है। बस जेब में चार-छह कॉकरोच रखिए और सीधे मंत्रालय की तरफ मार्च कर दीजिए।

आखिरकार, जो सरकार जनता के वोट और आंसुओं से नहीं डरती, वह कम से कम रसोई के इन छोटे-छोटे बिन-बुलाए मेहमानों के खौफ से तो डर ही गई। भारत की राजनीति में इस ‘कीट-क्रांति’ का नाम हमेशा सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। जय कॉकरोच, जय छात्र शक्ति!


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कागा जी