दिल्ली के दिल यानी सेंट्रल पार्क में एक भारी राष्ट्रीय आपदा टल गई! नहीं-नहीं, कोई उल्कापिंड नहीं गिर रहा था और न ही कोई नया टैक्स कानून लागू हो रहा था। मामला इससे भी ज़्यादा संगीन था। BBC की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, ‘कॉकरोच पार्टी’ (CJP) के महान संस्थापक अभिजीत दिपके अपने समर्थकों के साथ गदर मचाने वाले थे। लेकिन हमारी मुस्तैद दिल्ली पुलिस ने ऐन वक्त पर उन्हें हिरासत में ले लिया। सच कहिए, अब जाकर लोकतंत्र की सांस में सांस आई है!
कॉकरोच की ईमानदारी और राजनीति का डीएनए
अब आप पूछेंगे कि ‘काक-वाणी’ को इस मामूली घटना में क्या खास दिखा? अरे जनाब, कौआ होने के नाते हम आसमान से सब देखते हैं। देश में सैकड़ों पार्टियां हैं जो खुद को शेर, चीता या गंगाजल जैसी पवित्र बताती हैं, मगर काम बिल्कुल कॉकरोच वाला ही करती हैं। कम से कम अभिजीत दिपके जी ने तो असीम ईमानदारी दिखाई और अपनी पार्टी का नाम ही ‘कॉकरोच पार्टी’ रख दिया! जो जीव परमाणु हमले के बाद भी ज़िंदा बच सकता है, उससे ज़्यादा मजबूत राजनीतिक प्रतीक और क्या हो सकता है?
‘हिट’ स्प्रे से भी नहीं मानेंगे ये नेता!
सेंट्रल पार्क में प्रदर्शन से ठीक पहले दिपके साहब की गिरफ्तारी यह साबित करती है कि सत्ता में बैठे लोग बाकी विपक्ष से उतना नहीं डरते, जितना एक असली ‘कॉकरोच’ से डरते हैं। पुलिस अधिकारियों ने जब उन्हें हिरासत में लिया होगा, तो शायद उन्होंने वॉटर कैनन या लाठियों की जगह मन ही मन ‘लाल हिट’ या ‘बेगॉन स्प्रे’ छिड़कने का विचार किया होगा! लेकिन अफ़सोस, राजनीति के कॉकरोच किसी रासायनिक छिड़काव से नहीं डरते, वे तो थाने की हाजत में भी कुतर-कुतर कर सरकारी चाय-समोसे का आनंद लेते हैं।
काक-वाणी का अंतिम ज्ञान
व्यवस्था को लगता है कि दिपके जी को गाड़ी में ठूँसकर उन्होंने आंदोलन को कुचल दिया है। लेकिन हुक्मरानों को यह नहीं पता कि कॉकरोच कभी अकेले नहीं आते, वे हमेशा सिंक के नीचे से या दीवार की दरारों से झुंड में निकलते हैं। आज एक अभिजीत दिपके हिरासत में हैं, कल सेंट्रल पार्क के हर गमले के नीचे से दो नए कार्यकर्ता रेंगते हुए बाहर आएंगे। इसलिए, हे सत्ताधीशों! लाठियां संभालकर रखिए और स्प्रे बोतलें तैयार रखिए, क्योंकि ‘काक-वाणी’ की अंतिम चेतावनी है—लोकतंत्र के इस घर में कॉकरोचों का आना-जाना तो यूं ही लगा रहेगा!
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