क्या ‘ट्रांसफर किंग’ तुकाराम मुंडे राजनीति को भी ‘सैनिटाइज’ कर देंगे? काक-वाणी का विश्लेषण

महाराष्ट्र की राजनीति में वैसे तो रोज ही नए ड्रामे होते हैं, लेकिन हाल ही में जब ‘सिंघम’ कहे जाने वाले आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंडे से राजनीति में आने का सवाल पूछा गया, तो राज्य के कई दिग्गज नेताओं के दिल की धड़कनें कुछ पल के लिए थम गईं। ‘काक-वाणी’ के विशेष सूत्रों के अनुसार, इस खबर के आते ही कई विधायकों ने तुरंत अपने बीपी की दवाएं मंगा लीं। आखिर मुंडे साहब का राजनीति में कदम रखना किसी ‘ईमानदारी के भूकंप’ से कम थोड़े ही होगा!

तबादला उद्योग पर मंडराया मंदी का खतरा!

तुकाराम मुंडे के करियर का सबसे बड़ा रिकॉर्ड उनका काम नहीं, बल्कि उनके ट्रांसफर हैं। लगभग बीस साल की नौकरी में पैंतीस से ज्यादा ट्रांसफर झेलने वाले मुंडे जी ने अपने सूटकेस हमेशा पैक रखने की कला में महारत हासिल कर ली है। अब जरा सोचिए, जो आदमी सरकारी दफ्तर में बैठकर नेताओं के पसीने छुड़ा देता था, अगर वह खुद नेता बन गया, तो उसे ट्रांसफर कौन करेगा? राजनीति का सबसे बड़ा और पसंदीदा खिलौना तो ‘तबादला’ ही है। अगर मुंडे जी खुद सत्ता की कुर्सी पर बैठ गए, तो वह अपनी ही पार्टी के दागी नेताओं का ट्रांसफर सीधे विपक्ष के पाले में कर देंगे!

राजनीति का ‘एडजस्टमेंट’ और मुंडे का ‘डिसिप्लिन’

भारतीय राजनीति का एक बहुत ही खूबसूरत और अलिखित नियम है – ‘एडजस्टमेंट’। यहाँ आज के दुश्मन, कल के भाई और परसों के गठबंधन सहयोगी होते हैं। लेकिन मुंडे साहब तो उस मिट्टी के बने हैं जो नियमों की किताब को ही धर्मग्रंथ मानते हैं। अगर वे राजनीति में आए, तो सुबह की कैबिनेट बैठक में ही आधे मंत्रियों पर फाइलें दबाने के आरोप में केस दर्ज करवा देंगे। वे अपनी ही सरकार के खिलाफ जांच बिठाने वाले पहले राजनेता बन सकते हैं। ऐसे में कौन सा राजनीतिक दल उन्हें अपने यहाँ शामिल करने का रिस्क लेगा? यह तो वैसा ही होगा जैसे कोई अपने ही घर में ‘भ्रष्टाचार विरोधी दस्ता’ किराए पर रख ले।

विपक्ष और सत्तापक्ष में ‘सिंघम’ का खौफ

इंडिया टुडे की खबर के अनुसार, जब मुंडे से राजनीति में आने पर सवाल हुआ, तो उन्होंने सस्पेंस बनाए रखा। इस सस्पेंस ने महाराष्ट्र के नेताओं की नींद हराम कर दी है। नेता सोच रहे हैं कि अगर मुंडे चुनाव लड़े, तो उनके चुनावी हलफनामे में संपत्ति के कॉलम में ‘शून्य’ और सिद्धांतों के कॉलम में ‘हिमालय’ नजर आएगा, जिसे देखकर मतदाता कहीं सचमुच जागरूक न हो जाएं! अंत में, काक-वाणी यही दुआ करती है कि मुंडे साहब सिस्टम में ही रहें, क्योंकि अगर वे राजनीति में आ गए, तो राजनीति से ‘मसाला’ और ‘मजा’ दोनों खत्म हो जाएगा। फिर नेताओं को भाषण की जगह नियमों की बात करनी पड़ेगी, जो लोकतंत्र के लिए बेहद उबाऊ होगा!


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कागा जी