‘गदर’ से लेकर ‘गर्म हवा’ तक: बॉलीवुड की वो 10 फिल्में जिन्होंने पर्दे पर उतारा बंटवारे का असली दर्द!

इतिहास के पन्नों में सन 1947 का बंटवारा एक ऐसा गहरा जख्म है, जिसकी टीस आज भी सरहद के दोनों तरफ महसूस की जाती है। इस दर्द, आंसुओं और अपनों से बिछड़ने की त्रासदी को बॉलीवुड ने समय-समय पर अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश की है। हाल ही में ‘द प्रिंट’ की एक रिपोर्ट में ऐसी ही 10 भारतीय फिल्मों का जिक्र किया गया है, जिन्होंने बंटवारे की उस खौफनाक हकीकत को बड़े पर्दे पर बेहद संजीदगी से उतारा। आइए, ‘काक-वाणी’ के इस खास सफर में जानते हैं कि सिनेमा ने इतिहास के इस सबसे बड़े दर्द को कैसे बयां किया।

क्लासिक ‘गर्म हवा’ से ‘गदर’ के जज्बात तक

जब भी विभाजन पर बनी फिल्मों की बात होती है, तो साल 1973 में आई एमएस सथ्यू की कालजयी फिल्म गर्म हवा का नाम सबसे पहले आता है। बलराज साहनी के बेमिसाल अभिनय से सजी यह फिल्म एक ऐसे मुस्लिम परिवार की कहानी है, जो बंटवारे के बाद भी भारत में ही रहने का फैसला करता है। यह फिल्म उस दौर के अकेलेपन, अविश्वास और पहचान के संकट को बेहद खूबसूरती से दिखाती है।

वहीं दूसरी तरफ, जब हम कमर्शियल सिनेमा की बात करते हैं, तो सनी देओल की ब्लॉकबस्टर फिल्म गदर: एक प्रेम कथा को कौन भूल सकता है? इस फिल्म ने रोमांस, एक्शन और देशभक्ति के कॉकटेल के साथ बंटवारे की त्रासदी को पेश किया। तारा सिंह का पाकिस्तान में जाकर हैंडपंप उखाड़ना सिर्फ एक एक्शन सीन नहीं था, बल्कि सरहद के पार अपनी मोहब्बत को वापस पाने का एक चीखता हुआ जज्बा था, जिसने थिएटर्स में तहलका मचा दिया था।

इतिहास का वो आईना, जिसने सबको रुलाया

सिर्फ ‘गर्म हवा’ या ‘गदर’ ही नहीं, बल्कि चंद्रप्रकाश द्विवेदी की ‘पिंजर’ और दीपा मेहता की ‘अर्थ’ (1947) जैसी फिल्मों ने भी विभाजन के क्रूर चेहरे को दुनिया के सामने रखा। फिल्म पिंजर में अमृता प्रीतम के मशहूर उपन्यास को पर्दे पर उतारा गया था, जिसने बंटवारे के दौरान महिलाओं पर हुए अत्याचारों और उनके संघर्ष को दिखाकर दर्शकों को झकझोर दिया था। इसके अलावा, मिल्खा सिंह की बायोपिक ‘भाग मिल्खा भाग’ में भी दिखाया गया कि कैसे बचपन में झेले गए बंटवारे के दंगों के घाव एक इंसान को जिंदगी भर चैन से सोने नहीं देते।

काक-वाणी का मानना है कि ये 10 फिल्में सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं हैं, बल्कि ये हमारे इतिहास का वो दस्तावेज हैं जो हमें याद दिलाते हैं कि नफरत की दीवारें चाहे कितनी भी ऊंची क्यों न हों, इंसानी जज्बात और मोहब्बत हमेशा जिंदा रहते हैं। अगर आपने इनमें से कोई फिल्म नहीं देखी है, तो इस वीकेंड अपनी वॉचलिस्ट में इन्हें जरूर शामिल करें!</p


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कागा जी