लंदन के ठंडे दफ्तरों में बैठकर गर्म चाय की चुस्कियां लेते हुए ‘द इकोनॉमिस्ट’ के गोरे साहबों को अचानक भारत के नागरिकों की बड़ी चिंता सताने लगी है। उनका ताजा ज्ञान आया है कि भारत सरकार बाहर वालों को रोकने के चक्कर में अपने ही लोगों को जाल में फंसा रही है। वाह! क्या दिव्य दृष्टि है! वैसे ‘काक-वाणी’ को इस बात पर रत्ती भर भी आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि हमारे देश में तो यह सदियों पुराना नियम है—’चोर भले ही निकल भागे, लेकिन चौकीदार का आईडी कार्ड दस बार जरूर चेक होना चाहिए।’
गोरे साहब का चश्मा और हमारी कागजी भूलभुलैया
अब हमारे गृह मंत्रालय का गणित ही कुछ ऐसा अनोखा है। सीमा पार से आने वाले चतुर सुजान तो राशन कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक सब जुगाड़ करके सिस्टम के ‘दामाद’ बन बैठते हैं। लेकिन असम या बंगाल के किसी सुदूर गांव का राम प्रसाद, जिसके दादा की जमीन और कागज दशकों पहले बाढ़ में बह गए थे, वह आज भी अपनी ‘भारतीयता’ साबित करने के लिए सन् 1971 का वो दस्तावेज ढूंढ रहा है जिसे दीमक कब का खा चुके हैं। द इकोनॉमिस्ट साहब, इसे ‘फंसाना’ नहीं कहते, इसे हमारी सरकारी भाषा में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा की कसरत’ कहते हैं। इसमें नागरिक का वजन भले ही घट जाए, लेकिन फाइलों का वजन हमेशा बढ़ता है!
‘घुसपैठिए’ और चुनावी मौसम का अनूठा रिश्ता
सच तो यह है कि हमारे देश में ‘घुसपैठिया’ महज एक इंसान नहीं, बल्कि एक बेहद कीमती चुनावी फसल है। जब तक हर चुनाव से पहले ‘दीमक’ और ‘घुसपैठिया’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का शोर नहीं गूंजेगा, तब तक देशभक्ति का तापमान कैसे बढ़ेगा? सरकार का सोचना बिल्कुल व्यावहारिक है—अगर हर किसी को आसानी से नागरिक मान लिया गया, तो फिर सरकारी दफ्तरों के चक्कर कौन काटेगा? बाबुओं की जेबें और फाइलों के ढेर कैसे गर्म होंगे?
लंदन के पत्रकारों को समझना चाहिए कि भारत एक ‘आत्मनिर्भर’ देश है। हम अपनी समस्याएं खुद पैदा करते हैं और फिर उन्हें सुलझाने के लिए करोड़ों रुपये की कमेटियां बनाते हैं। घुसपैठियों को छानने की इस छलनी में अगर कुछ लाख असली भारतीय भी छनकर बाहर गिर जाएं, तो राष्ट्रहित में इतना बलिदान तो बनता ही है! आखिर, अपनों पर शक करने का जो सुख है, वो परायों को खदेड़ने में कहां!
‘काक-वाणी’ का तो बस यही निष्कर्ष है—कागजों की इस जंग में जो बाबू की जेब गर्म कर दे वो असली नागरिक, और जो अपनी गरीबी के सबूत लिए कतार में खड़ा रहे, वो इस महान तंत्र का स्थायी शिकार!
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें