जब ‘झक्कास’ अनिल कपूर को बॉलीवुड में करना पड़ा स्ट्रगल, तब तेलुगू सिनेमा ने बनाया सुपरस्टार!

बॉलीवुड के ‘एवरग्रीन’ एक्टर अनिल कपूर का नाम सुनते ही दिमाग में सिर्फ एक ही शब्द गूंजता है— ‘झक्कास!’ 67 की उम्र में भी 27 के दिखने वाले अनिल कपूर आज भले ही इंडस्ट्री पर राज कर रहे हों, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनका शुरुआती दौर इतना आसान नहीं था? एक समय ऐसा था जब हिंदी सिनेमा के दरवाजे उनके लिए आसानी से नहीं खुल रहे थे। ऐसे में उन्हें मिला साउथ यानी तेलुगू सिनेमा का सहारा, जहां से चमकी उनकी किस्मत!

जब बॉलीवुड में स्ट्रगल के बीच मिला साउथ का सहारा

80 के दशक की शुरुआत में अनिल कपूर हिंदी फिल्मों में बतौर मुख्य हीरो एंट्री करने के लिए दर-दर भटक रहे थे। ऑडिशन पर ऑडिशन देने के बाद भी उन्हें वो बड़ा ब्रेक नहीं मिल पा रहा था जिसका उन्हें इंतजार था। लगातार मिल रहे रिजेक्शन से निराश होने के बजाय अनिल कपूर ने एक अलग राह चुनी। उन्होंने तय किया कि हुनर दिखाने के लिए भाषा कभी मजबूरी नहीं बनेगी।

इसी दौर में साल 1980 में उनके हाथ लगी महान निर्देशक बापू की तेलुगू फिल्म ‘वमसा व्रुक्षम’ (Vamsa Vruksham)। इस फिल्म में अनिल कपूर को लीड रोल मिला। तेलुगू दर्शकों ने इस युवा और ऊर्जावान एक्टर को खुले दिल से अपनाया। साउथ के सेट पर काम करते हुए अनिल कपूर ने न सिर्फ एक्टिंग की नई तकनीकें सीखीं, बल्कि कैमरे के सामने उनका खोया हुआ आत्मविश्वास भी वापस लौट आया।

तेलुगू के फैन बेस से बॉलीवुड का ‘मिस्टर इंडिया’ बनने का सफर

तेलुगू सिनेमा में मिली सफलता ने अनिल कपूर के करियर को एक नई दिशा दी। वहां से मिले तजुर्बे के दम पर उन्होंने दोबारा बॉलीवुड का रुख किया। इसके बाद 1983 में आई फिल्म ‘वो सात दिन’ से उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम जमाए। फिर क्या था, ‘तेजाब’, ‘राम लखन’, ‘मिस्टर इंडिया’ और ‘नायक’ जैसी एक से बढ़कर एक ब्लॉकबस्टर फिल्मों के साथ अनिल कपूर बॉलीवुड के बेताज बादशाह बन गए।

काक-वाणी की इस खास रिपोर्ट से यह तो साबित होता है कि अनिल कपूर का साउथ कनेक्शन आज के ‘पैन-इंडिया’ ट्रेंड से दशकों पुराना है। अनिल कपूर की यह अनदेखी कहानी सिखाती है कि अगर आपके अंदर काबिलियत और जुनून है, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती। तो दोस्तों, अनिल कपूर का यह ‘तेलुगू टू बॉलीवुड’ सफर आपको कैसा लगा?


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कागा जी