ड्रैगन का ‘पड़ोस-प्रेम’ और हमारी ‘लाल आंखें’: जब पड़ोसी ही बन गए चीन के ‘पेइंग गेस्ट’!

अहा! क्या अद्भुत कूटनीतिक समय है। जब सारा देश टीवी स्क्रीन पर ‘विश्वगुरु’ बनने की बधाई स्वीकार करने में व्यस्त है, तभी जर्मनी के ‘डीडब्ल्यू’ (DW) ने एक छोटी सी शरारत कर दी। उन्होंने खबर छाप दी कि दक्षिण एशिया में चीन महाशय हमारे ‘प्रभाव क्षेत्र’ में अपनी चौखट बड़ी कर रहे हैं। अब भला बताइए, हमारे घर के आंगन में कोई तंबू तान दे और हम कहें कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ चल रहा है, तो इसमें क्या गलत है? कूटनीति तो इसी को कहते हैं कि पड़ोसी को घर भी दे दो और खुद को मकान मालिक भी बताते रहो!

‘लाल आंख’ का चश्मा और पड़ोसियों का नया चस्का

हमारी विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत रही है—’लाल आंखें दिखाना’। लेकिन लगता है ड्रैगन को मोतियाबिंद है, उसे हमारी लाल आंखें दिखाई ही नहीं देतीं। श्रीलंका से लेकर मालदीव और नेपाल तक, सबने हमारे ‘ट्विटर ट्रेंड्स’ और ‘बहिष्कार’ को इतनी गंभीरता से लिया कि वे सीधे बीजिंग की गोद में जा बैठे। मालदीव ने कहा कि हम भारत के पर्यटकों से नहीं, चीन के कर्ज से अपना पेट भरेंगे। वाह! इसे कहते हैं कूटनीतिक सफलता, जहां पड़ोसी हमारे डर से नहीं, बल्कि चीन के पैसों के लालच में हमसे दूर भाग रहे हैं।

ट्विटर पर सर्जिकल स्ट्राइक बनाम जमीन पर ‘बेल्ट एंड रोड’

जब चीन हमारे पड़ोसियों को बंदरगाह, पुल और रेलवे ट्रैक बांट रहा था, तब हमारे वीर योद्धा मालदीव के समुद्र तटों का सोशल मीडिया पर बहिष्कार कर रहे थे। ‘काक-वाणी’ का मानना है कि यह सरकार का एक और मास्टरस्ट्रोक है। हम चीन को उसकी सेना से नहीं, बल्कि अपनी ‘अपेक्षा’ (इग्नोरेंस) से मारेंगे। चीन वहां कंक्रीट के पुल बना रहा है, और हम यहां राष्ट्रवाद की हवा भर रहे हैं। अब देखना यह है कि ड्रैगन के कर्ज के जाल में फंसे हमारे पड़ोसी कब ‘घर वापसी’ के लिए चिल्लाते हैं। तब तक, हम उन्हें अपनी खिड़की से देखकर मुस्कुरा सकते हैं।

आखिरकार, यदि चीन हमारे चारों तरफ घेरा बना रहा है, तो इसे कूटनीतिक विफलता कहना पाप होगा। यह तो हमारी ‘सुरक्षा’ है—हम चारों तरफ से घिरकर अधिक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं! विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता को अब एक नया बयान तैयार रखना चाहिए: “चीन का हमारे पड़ोस में आना दरअसल भारत की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति का चीनी अनुवाद है।” जय हो हमारी कूटनीति की!


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कागा जी