पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले साहब ने एक बेहद गंभीर ज्ञान दिया है—”भारत को चीन की घरेलू राजनीति का बारीकी से अध्ययन करना चाहिए।” वाह! क्या मशवरा है। हमारे नीति-निर्माता और नेता, जो खुद को चाणक्य की अट्ठारहवीं पीढ़ी का सीधा वंशज बताते हैं, अब ड्रैगन के घर में झांककर उसकी राजनीति का ककहरा सीखेंगे? वैसे, ‘काक-वाणी’ को लगता है कि यह सलाह थोड़ी देर से आई है, क्योंकि हमारे हुक्मरान पहले से ही चीनी मॉडल के कुछ चुनिंदा अध्यायों को बिना बताए ही कंठस्थ कर चुके हैं।
वन-पार्टी सिस्टम: हमारे नेताओं का परम सपना
चीन की राजनीति में सबसे खूबसूरत बात क्या है? वहां विपक्ष का कोई झंझट ही नहीं है। न कोई फालतू की प्रेस कॉन्फ्रेंस, न संसद में हंगामा करने वाला कोई विपक्ष, और न ही अदालतों की तरफ से कोई तीखा सवाल। हमारे देश के नेता जब चीन की इस ‘शांति’ को देखते होंगे, तो उनकी आंखों में ईर्ष्या के आंसू आ जाते होंगे। वे सोचते होंगे—”काश! हमारे पास भी एक शी जिनपिंग जैसी शक्ति होती, जो बिना किसी चुनाव आयोग के झंझट के खुद को हमेशा के लिए ‘परमेश्वर’ घोषित कर दे।” इस मामले में तो हमारे नेता चीन से ट्यूशन लेने के लिए आधी रात को भी तैयार हो जाएंगे।
‘लाल आँख’ और टिकटॉक बैन करने की कला
गोखले साहब का कहना है कि चीन के घरेलू मुद्दों को समझे बिना हम उनकी विदेश नीति को नहीं समझ सकते। लेकिन हुजूर, हमारे पास तो अपनी स्वदेशी कूटनीति है। जब भी चीन सीमा पर अपनी चौकियों का विस्तार करता है, हम यहां चीनी ऐप्स बैन कर देते हैं। जब वे हमारे गांवों के नाम बदलते हैं, हम टीवी चैनलों पर चीनी सामान के बहिष्कार की कसम खा लेते हैं। अब इसके लिए बीजिंग की कम्युनिस्ट पार्टी के जटिल दस्तावेजों को पढ़ने की क्या जरूरत? हमारे लिए तो चुनावी रैलियों में चीन को ‘लाल आंख’ दिखाना ही सबसे बड़ी कूटनीति है।
डिग्री ‘एंटायर पॉलिटिकल साइंस’ की, पर पढ़ना पड़ेगा चीन?
आखिर में, ‘काक-वाणी’ की कौआ-दृष्टि यह पूछती है कि जो नेता चुनाव जीतने के बाद अपनी ही पार्टी का घोषणापत्र भूल जाते हैं, वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का ‘माओ-थॉट’ कैसे पढ़ेंगे? हमारे नेताओं के पास जब ‘एंटायर पॉलिटिकल साइंस’ की अदभुत डिग्रियां हैं, तो उन्हें शी जिनपिंग के सिद्धांतों की क्या जरूरत? चीन वाले भले ही सेमीकंडक्टर और सुपरपावर बनने की राजनीति करें, हमारे यहां तो आज भी चुनाव ‘धर्म, जाति और मुफ्त की रेवड़ियों’ के घरेलू नुस्खों से ही जीते जाते हैं। इसलिए गोखले जी, अपनी सलाह वापस लीजिए। हमारे नेताओं को अपनी ही राजनीति में रहने दीजिए, वरना कहीं उन्होंने सच में चीन का गहरा अध्ययन कर लिया, तो हमारे बचे-खुचे लोकतांत्रिक अधिकार भी ड्रैगन की ‘ग्रेट वॉल’ के पीछे दफन हो जाएंगे!
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें