तिग्मांशु धूलिया ने खोली बॉलीवुड की पोल! बोले- ‘आजकल की हिंदी फिल्में मेरी बुद्धि का अपमान हैं’

बॉलीवुड में जब भी कोई बेबाक और कड़वी बात कहनी हो, तो तिग्मांशु धूलिया का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। ‘हासिल’ और ‘पान सिंह तोमर’ जैसी कल्ट क्लासिक फिल्में बनाने वाले इस दिग्गज डायरेक्टर ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया है, जिससे पूरी फिल्म इंडस्ट्री में सनसनी मच गई है। ‘द हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया’ को दिए एक इंटरव्यू में तिग्मांशु ने आज के बॉलीवुड सिनेमा का ऐसा पोस्टमार्टम किया है कि बड़े-बड़े मेकर्स के पसीने छूट गए हैं।

बुद्धि का अपमान हैं आज की फिल्में!

तिग्मांशु धूलिया ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे शब्दों में कहा, “मुझे लगता है कि हालिया हिंदी फिल्में मेरी बुद्धि का अपमान हैं।” उनका यह बयान सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है। तिग्मांशु का मानना है कि आजकल के फिल्ममेकर्स दर्शकों को नासमझ समझने लगे हैं। वे स्क्रीन पर ऐसी कहानियां परोस रहे हैं जिनका न कोई सिर है और न पैर। एक समय था जब हिंदी सिनेमा में किरदारों के विकास और मजबूत पटकथा पर काम होता था, लेकिन आज केवल सतही मनोरंजन बेचा जा रहा है।

मसाला फिल्मों और वीएफएक्स का ओवरडोज

आज के दौर में जहां भारी-भरकम बजट, वीएफएक्स (VFX) और बेमतलब के एक्शन सीन्स को ही सिनेमा का पैमाना मान लिया गया है, वहां तिग्मांशु धूलिया का यह गुस्सा बिल्कुल जायज लगता है। काक-वाणी के गलियारों में भी इस बात की खूब चर्चा है। आजकल की फिल्में थिएटर्स में केवल शोर मचाती हैं, लेकिन दर्शकों के दिलों को छूने में पूरी तरह नाकाम रहती हैं। मौलिक कहानियां गायब हो चुकी हैं और उनकी जगह रीमेक और फॉर्मूला फिल्मों ने ले ली है।

काक-वाणी का नजरिया: सच कड़वा होता है!

काक-वाणी के विश्लेषकों का मानना है कि तिग्मांशु धूलिया ने फिल्म इंडस्ट्री की सबसे दुखती रग पर हाथ रखा है। जब करोड़ों रुपये सिर्फ स्टार्स की फीस और पब्लिसिटी पर फूंक दिए जाते हैं, और स्क्रिप्ट राइटर्स को हाशिए पर धकेल दिया जाता है, तो परिणाम स्वरूप ऐसी ही फिल्में बनती हैं जो दर्शकों की बुद्धिमत्ता का मजाक उड़ाती हैं। ओटीटी के इस दौर में जहां दर्शक बेहतरीन वैश्विक कंटेंट देख रहे हैं, वहां बॉलीवुड का यह पुराना और घिसा-पिटा ढर्रा अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला।

अब देखना यह है कि क्या बॉलीवुड के बड़े प्रोडक्शन हाउस तिग्मांशु धूलिया के इस कड़वे सच से कोई सबक लेते हैं या फिर दर्शकों को वही ‘दिमाग घर छोड़कर थियेटर आओ’ वाला सिनेमा परोसते रहेंगे। तो दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि बॉलीवुड फिल्में अब आपकी बुद्धिमत्ता का मजाक उड़ा रही हैं? अपने विचार काक-वाणी के साथ जरूर शेयर करें!


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कागा जी