धरना-प्रदर्शनों का ‘सुहावना मौसम’ और हमारी ‘हिलती’ राजनीति!

वाह! क्या शानदार शीर्षक है! अंग्रेजी मीडिया के पत्रकारों को भी कमाल का मुगालता है। वे बड़े भारी मन से पूछ रहे हैं कि प्रदर्शनों के इस ‘मौसम’ ने भारतीय राजनीति को हिला दिया है, अब आगे क्या होगा? अरे भाई! भारत में धरना-प्रदर्शन कोई अचानक आया आंधी-तूफान नहीं हैं, जो राजनीति की नींव हिला दें। ये तो हमारे लोकतंत्र के मौसमी फल हैं, जो हर चुनाव से ठीक पहले बाजार में आ जाते हैं।

जैसे मानसून में सड़कें गड्ढों से भर जाती हैं, वैसे ही चुनावी मौसम आते ही राष्ट्रीय राजमार्ग तंबुओं और पोस्टरों से सज जाते हैं। जब आम नागरिक ट्रैफिक में फंसा हुआ हॉर्न बजा रहा होता है, तब हमारे राजनेता अपने वातानुकूलित कमरों में बैठकर यह गणित लगा रहे होते हैं कि इस प्रदर्शन को किस ‘टूलकिट’ या ‘विदेशी साजिश’ का नाम दिया जाए।

आगे क्या होगा? ‘काक-वाणी’ का सटीक भविष्यफल

अब आते हैं उस यक्ष प्रश्न पर—‘आगे क्या होगा?’ बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषक टीवी स्टूडियो में बैठकर बाल नोच रहे हैं, लेकिन ‘काक-वाणी’ के पास इसका बिल्कुल मुफ्त और सटीक जवाब है। आगे वही होगा जो पिछले सात दशकों से होता आया है।

सबसे पहले, सत्तापक्ष एक अति-उच्चस्तरीय ‘जांच समिति’ का गठन करेगा। इस समिति में ऐसे विद्वान शामिल होंगे, जिनकी मुख्य जिम्मेदारी मामले को ठंडे बस्ते में डालना होगी। यह समिति अगले तीन साल तक सरकारी खर्चे पर चाय-समोसे खाएगी और 1000 पन्नों की एक ऐसी रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसे दीमक भी पढ़ने से इनकार कर दें।

दूसरी तरफ, विपक्ष इस ‘जन-आक्रोश’ की फोटो अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके ‘क्रांति’ का ढोल पीटेगा। विपक्ष के नेताजी प्रदर्शन स्थल पर आकर दो मिनट का भाषण देंगे, प्रदर्शनकारियों के साथ सेल्फी लेंगे और फिर अपनी चमचमाती लग्जरी गाड़ी में बैठकर एसी की हवा खाने चले जाएंगे।

जनता का क्या?

अंत में प्रदर्शनकारी थक-हारकर अपने घर लौटेंगे, क्योंकि बिजली का बिल और बच्चों की फीस किसी क्रांति से माफ नहीं होती। राजनीति फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौट आएगी—कोई नया धर्म-जात का विवाद, कोई क्रिकेट मैच या किसी बॉलीवुड सितारे का बयान आपका ध्यान भटकाने के लिए परोस दिया जाएगा।

इसलिए ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ वालों! ज्यादा हैरान मत होइए। भारत में मौसम बदलते रहते हैं, प्रदर्शन आते-जाते रहते हैं, लेकिन हमारी राजनीति की बेशर्मी का मौसम सदाबहार रहता है!


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कागा जी