नेहरू की आत्मा और मोदी जी की ‘उम्मीद’: जब तक कांग्रेस है, तब तक बहाने हैं!

देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए की महाबैठक में एक बार फिर इतिहास के पन्नों से धूल झाड़ते हुए वह महामंत्र दोहराया है, जो पिछले दस सालों से हमारी राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखे हुए है। जी हां, उन्होंने फरमाया कि कांग्रेस के कुशासन ने देश को ‘निराशा’ के अंधकार में धकेल दिया था। अब यह अलग बात है कि पिछले एक दशक से सत्ता की बागडोर खुद उनके मजबूत हाथों में है, लेकिन जब तक देश में नेहरू का नाम और कांग्रेस का निशान रहेगा, तब तक अपनी हर नाकामी का ठीकरा फोड़ने के लिए एक सुरक्षित और टिकाऊ पता हमारे पास हमेशा मौजूद रहेगा।

द ग्रेट ‘नेहरू पुराण’ और हमारी उम्मीदें

काक-वाणी के पाठकों को यह बारीकी समझनी होगी कि राजनीति में ‘उम्मीद’ एक ऐसा जादुई उत्पाद है जिसे केवल बेचा जाता है, कभी डिलीवर नहीं किया जाता। प्रधानमंत्री जी का यह कहना बिल्कुल शत-प्रतिशत सही है कि कांग्रेस ने हमें गहरी निराशा में धकेला। अब देखिए न, आज अगर देश का युवा बेरोजगार घूम रहा है, तो वह भी कांग्रेस की फैलाई हुई ऐतिहासिक निराशा का ही एक हिस्सा है। अगर आज महंगाई आसमान छू रही है, तो निश्चित रूप से इसकी साजिश १९५० या ६० के दशक में ही रच दी गई होगी। हमारे वर्तमान शासक तो केवल हमें उस ऐतिहासिक निराशा से निकालने के लिए दिन-रात ‘उम्मीदों’ के दिव्य झूले झुला रहे हैं।

दस साल का रिपोर्ट कार्ड: ‘भूतकाल’ ही हमारा ‘भविष्य’ है

एक आम और नासमझ नागरिक सोच सकता है कि दस साल का कार्यकाल किसी भी सरकार के लिए अपनी लकीर बड़ी करने के लिए काफी होता है। लेकिन राजनीति के आधुनिक चाणक्य जानते हैं कि अपनी लकीर बड़ी करने से ज्यादा आसान दूसरों की लकीर को छोटा बताना और उस पर कालिख पोतना है। एनडीए के इस कुनबे में बैठे सभी छोटे-बड़े वीरों ने एक सुर में ताली बजाकर इस शाश्वत सत्य को स्वीकार किया। जब तक हम जनता को यह समझाते रहेंगे कि उनके परदादा ने गलत पार्टी को वोट दिया था, तब तक वर्तमान पीढ़ी को रोजगार और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मांगने का नैतिक अधिकार भला कैसे मिल सकता है?

धन्य है हमारी राजनीति और धन्य हैं हमारे नेता, जो भूतकाल के मलबे पर खड़े होकर भविष्य के सुनहरे महलों का नक्शा बेच रहे हैं। काक-वाणी की ओर से देश की महान जनता को यही मुफ्त सलाह है कि वे महंगाई, बदहाली और गिरते रुपये को कांग्रेस की ‘विरासत’ मानकर सहना सीख लें, और वर्तमान सरकार द्वारा परोसी जा रही ‘उम्मीद’ की कड़क चाय की चुस्कियां लेते रहें। आखिर, उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है, चाहे जेब खाली हो और पेट में चूहे ही क्यों न कूद रहे हों!


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी