न्याय की गुहार और एक लाचार पिता
मुगल साम्राज्य की चकाचौंध के बीच एक दिन शहंशाह अकबर के दरबार में एक बेहद मार्मिक दृश्य सामने आया। एक बूढ़ा, अंधा बुनकर, जिसका नाम रहमत था, अपनी दस साल की पोती का हाथ थामे रोता हुआ दरबार में आया। रहमत के जीवन का एकमात्र सहारा वही पोती थी। उसने अपनी पूरी जिंदगी की गाढ़ी कमाई—सोने के पचास सिक्के—एक मखमली थैली में छिपाकर रखे थे, ताकि वह अपनी पोती की शादी धूमधाम से कर सके। लेकिन पिछली रात किसी ने उसकी वह पोटली चुरा ली।
रहमत ने रोते हुए कहा, “जहाँपनाह, मैं अंधा हूँ। मैंने चोर को देखा नहीं, लेकिन वह शख्स मेरे बहुत करीब था, क्योंकि केवल मेरे तीन पड़ोसियों को ही पता था कि वह पोटली कहाँ रखी थी। मेरी जिंदगी की मेहनत लूट गई, अब मेरी बच्ची का क्या होगा?” अकबर का दिल पिघल गया, लेकिन बिना सबूत के सजा कैसे दी जाए? उन्होंने हमेशा की तरह अपने चतुर मंत्री बीरबल की ओर देखा।
बीरबल की अनोखी युक्ति
बीरबल ने बूढ़े रहमत की आँखों में छिपे दर्द को महसूस किया। उन्होंने तीनों संदिग्ध पड़ोसियों को दरबार में बुलवाया। तीनों ने खुद को बेगुनाह बताया। तब बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह कोई साधारण चोरी नहीं है। इस चोरी में एक गरीब के आँसू शामिल हैं। मेरे पास एक चमत्कारी बर्तन है, जिसके अंदर ‘ईमानदारी का इत्र’ है। मैंने उस बर्तन पर एक काला कपड़ा ढक दिया है।”
बीरबल ने आगे समझाया, “आप तीनों को एक-एक करके उस अंधेरे कमरे में जाना होगा और उस काले कपड़े के अंदर हाथ डालकर उस जादुई बर्तन को छूना होगा। जिसने चोरी नहीं की होगी, उसके हाथों से मोगरे की खुशबू आएगी। लेकिन जिसने उस अंधे लाचार की कमाई चुराई है, उस पापी के हाथ पर जादुई बर्तन काला रंग छोड़ देगा, जो कभी नहीं छूटेगा।”
भावनाओं का इम्तिहान और न्याय
एक-एक करके तीनों पड़ोसी कमरे के भीतर गए और बाहर आए। बीरबल ने तीनों को अपने हाथ आगे करने को कहा। पहले दो पड़ोसियों के हाथ कोयले की कालिख से पूरी तरह काले हो चुके थे, लेकिन तीसरे पड़ोसी के हाथ बिल्कुल साफ थे।
शहंशाह अकबर चकित रह गए और बोले, “बीरबल! इसके हाथ तो साफ हैं, तो क्या यही बेगुनाह है?”
बीरबल ने सिर झुकाकर कहा, “नहीं जहाँपनाह, यही असली चोर है। मैंने उस बर्तन पर कोई जादुई इत्र नहीं लगाया था, बल्कि उस पर कालिख पोत दी थी। जो बेगुनाह थे, उन्हें कोई डर नहीं था, इसलिए उन्होंने बर्तन को छुआ और उनके हाथ काले हो गए। लेकिन इस चोर के मन में पाप था। इसे डर था कि जादुई बर्तन इसके हाथ काले कर देगा, इसलिए इसने बर्तन को छुआ ही नहीं और इसके हाथ साफ रह गए।”
चोर बीरबल की इस चतुराई के आगे घुटने टेक बैठा। उसने रोते हुए अपनी गलती स्वीकार की और रहमत की सोने के सिक्कों की थैली वापस कर दी। अकबर ने चोर को कारागार में डाल दिया और बीरबल की बुद्धिमानी की दिल से तारीफ की।
कहानी से सीख (Moral)
सीख: बुराई चाहे कितनी भी चालाकी से क्यों न की जाए, डर और अपराधबोध इंसान को खुद ही बेनकाब कर देते हैं। न्याय के सामने झूठ की उम्र बहुत छोटी होती है।