लीजिए साहब, वैश्विक शांति के स्वघोषित मसीहा और परमाणु बटन को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले व्लादिमीर पुतिन आखिरकार भारत की पावन धरती पर पधार चुके हैं। मौका है ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का, जिसे पश्चिमी देश ‘बहिष्कृत नेताओं का क्लब’ कहते हैं और हम इसे ‘मल्टीपोलर वर्ल्ड’ का नया सवेरा बताते हैं। जब दुनिया यूक्रेन युद्ध के बारूद और अमेरिकी टैरिफ की नई धमकियों से थरथरा रही है, तब हमारे पुतिन दादा दिल्ली की सड़कों पर कूटनीति की ठंडी हवा खाने आए हैं।
युद्ध और शांति की अनोखी जुगलबंदी
यह देखना बेहद दिलचस्प है कि एक तरफ गाजा और यूक्रेन में बम बरस रहे हैं, और दूसरी तरफ ब्रिक्स देश चाय की चुस्कियों के साथ ‘शांति और स्थिरता’ पर लंबे-चौड़े घोषणापत्र तैयार कर रहे हैं। पुतिन साहब का भारत आना वैसा ही है जैसे कोई मोहल्ले का सबसे बड़ा दबंग, पंचायत में बैठकर सबको अहिंसा का पाठ पढ़ाए। हमारे भारतीय कूटनीति के चाणक्य भी बिल्कुल तैयार बैठे हैं। वे अमेरिकी राष्ट्रपति को भी मुस्कुराकर ‘बाय’ कहेंगे और पुतिन को कसकर गले लगाकर ‘वेलकम’ भी करेंगे। कूटनीति इसी दोहरेपन का तो दूसरा नाम है, जनाब!
डॉलर को ठेंगा दिखाने का पुराना खेल
इस सम्मेलन की सबसे बड़ी नौटंकी है ‘डी-डॉलरलाइजेशन’ यानी डॉलर को उखाड़ फेंकने का संकल्प। हर ब्रिक्स समिट में यह कसम खाई जाती है कि हम डॉलर की बादशाहत खत्म कर देंगे। लेकिन जैसे ही सम्मेलन खत्म होता है, सब देश चुपके से अपनी तिजोरी में रखे डॉलर को चूमने लगते हैं। पुतिन चाहते हैं कि भारत अपनी करेंसी में व्यापार करे, और भारत सोच रहा है कि रूस के सस्ते तेल के बदले मिले अरबों रूबल का हम करेंगे क्या? क्या दिल्ली के कनाट प्लेस में अब रूबल से गोलगप्पे मिलेंगे? खैर, जब तक ट्रंप साहब नए टैरिफ का डंडा चला रहे हैं, तब तक ये देश मिलकर सिर्फ एक-दूसरे का हाथ पकड़कर ‘हम होंगे कामयाब’ गा सकते हैं।
काक-वाणी की अंतिम चुटकी
आखिर में, इस पूरे तमाशे से निकलेगा क्या? कुछ नहीं, बस एक भव्य और भारी-भरकम संयुक्त बयान, जिसमें ‘ग्लोबल साउथ’ के अधिकारों की दुहाई दी जाएगी। इसके बाद सब नेता अपने-अपने देश लौटकर अगले युद्ध या अगले आर्थिक प्रतिबंध की तैयारी में जुट जाएंगे। पुतिन साहब के स्वागत में बिछी यह लाल कालीन गवाह है कि दुनिया में असली ताकत सिद्धांतों की नहीं, बल्कि सस्ते कच्चे तेल और कूटनीतिक मजबूरियों की होती है। तो बोलिए, जय ब्रिक्स!
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