अरे सुनो भाई! अपने काम-धंधे छोड़ो और तुरंत घबराना शुरू करो! प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका ‘फ्रंटलाइन’ ने अभी-अभी पूरे ब्रह्मांड को सूचित किया है कि भारत का राजनीतिक संकट ‘अत्यंत गहरा’ हो गया है और प्रधानमंत्री मोदी ‘जनता के भयंकर गुस्से’ का सामना कर रहे हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि अगर देश में इतना बड़ा संकट आ गया है, तो आपकी गली का नुक्कड़ वाला चायवाला अभी तक केतली क्यों खौला रहा है? वह सड़कों पर क्रांति की मशाल लेकर क्यों नहीं दौड़ रहा?
‘संकट’ का नया अंतरराष्ट्रीय मानक
दरअसल, गलती आपकी और हमारी है। हमारे देश की नासमझ जनता को पता ही नहीं चलता कि वह कब ‘भयंकर गुस्से’ में आ चुकी है। बेचारी जनता तो रोज सुबह उठकर दफ्तर निकल जाती है, शाम को सब्जी के दाम पर दो बातें बोलती है और चुनाव आते ही फिर से उन्हीं ‘संकटग्रस्त’ मोदी जी को वोट देने के लिए लाइन में लग जाती है। लेकिन धन्यवाद मानिए हमारे देश के अंग्रेजी बुद्धिजीवी पत्रकारों का, जो वातानुकूलित (AC) कमरों में बैठकर दो कप फिल्टर कॉफी पीते ही 140 करोड़ जनता की नब्ज पहचान लेते हैं।
इन ज्ञानियों के अनुसार, देश में लोकतंत्र अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। संकट इतना गहरा है कि बेचारी विपक्षी पार्टियां भी थक-हारकर छुट्टी मनाने विदेश चली जाती हैं। उधर मोदी जी इस ‘जन-आक्रोश’ से इतने थर-थर कांप रहे हैं कि डर के मारे दिन में तीन राज्यों में चुनावी रैलियां निपटा रहे हैं और रात को नई परियोजनाओं की फाइलें देख रहे हैं। आह! क्या खौफनाक माहौल है!
ड्राइंग रूम की ‘क्रांति’ और जमीनी हकीकत
‘काक-वाणी’ का स्पष्ट मानना है कि भारत में ‘राजनीतिक संकट’ की परिभाषा बहुत सरल हो चुकी है। जब भी किसी पत्रिका को अपनी गिरती बिक्री बचानी होती है या किसी विश्लेषक को अपनी अंग्रेजी चमकानी होती है, तो वह एक कवर स्टोरी चिपका देता है—”मोदी संकट में हैं!” यह ‘जनता का गुस्सा’ इतना गुप्त और दिव्य होता है कि इसे देखने के लिए एक विशेष चश्मे की जरूरत पड़ती है, जो सिर्फ लुटियंस दिल्ली और बड़े-बड़े सेमिनारों में ही बांटा जाता है।
आम जनता बेचारी इतनी मूर्ख है कि उसे इस संकट का अहसास ही नहीं हो रहा। वह तो आज भी महंगाई और बेरोजगारी की शिकायत करते-करते शाम को मोदी जी के भाषण का रील्स देखने में मस्त है। खैर, हम तो ‘फ्रंटलाइन’ की इस दूरदृष्टि को सलाम करते हैं। हमारी बस इतनी सलाह है कि अगली बार संकट की रिपोर्ट छापने के साथ-साथ थोड़ा ग्राउंड रिपोर्टिंग का कष्ट भी उठा लें, वरना कहीं ऐसा न हो कि संकट रिपोर्ट में ही रह जाए और देश आगे निकल जाए!
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