विश्वास और ममता का एक अनोखा बंधन
बहुत समय पहले की बात है, एक शांत और सुंदर गांव में देवदत्त नाम का एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी शारदा और एक छोटे से नवजात बेटे के साथ रहता था। देवदत्त और शारदा ने अपने घर में एक छोटे से नेवले को भी पाला हुआ था। वह नेवला दिखने में तो जानवर था, लेकिन उसका दिल इंसानों से भी अधिक वफादार था। शारदा अपने बेटे की तरह ही उस नेवले को भी प्यार करती थी और उसे दूध पिलाती थी। दोनों बच्चे एक साथ ही घर के आंगन में खेलते और बड़े हो रहे थे।
एक खौफनाक दोपहर और मां का अविश्वास
एक दिन दोपहर के समय, देवदत्त भिक्षा मांगने पास के गांव गया हुआ था। शारदा को कुएं से पानी भरने जाना था। घर में उसका छोटा बच्चा पालने में सो रहा था। शारदा ने नेवले की तरफ देखा, जो पालने के पास ही बैठा था। हालांकि नेवला बहुत वफादार था, लेकिन फिर भी एक मां का दिल घबरा रहा था। शारदा ने नेवले को पुचकारा और कहा, “मेरे बच्चे का ध्यान रखना, मैं अभी पानी लेकर आती हूं।”
शारदा के जाने के कुछ ही समय बाद, एक बड़ा और जहरीला काला सांप कहीं से रेंगता हुआ कमरे में दाखिल हुआ। वह सांप सीधे उस पालने की तरफ बढ़ रहा था जहां मासूम बच्चा सो रहा था। नेवले की नजर जैसे ही उस सांप पर पड़ी, उसका खून खौल उठा। अपने रक्षक धर्म को निभाते हुए, नेवले ने बिना अपनी जान की परवाह किए सांप पर हमला कर दिया। दोनों के बीच एक भयानक जंग हुई। अंत में, नेवले ने उस जहरीले सांप के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और अपने छोटे भाई की जान बचा ली। इस लड़ाई में नेवले का मुंह और पैर सांप के खून से पूरी तरह सन गए थे।
जल्दबाजी में लिया गया भयानक फैसला
अपनी जीत और वफादारी की खुशी में झूमता हुआ नेवला अपनी मां (शारदा) को यह बताने के लिए मुख्य द्वार पर आकर बैठ गया। जैसे ही शारदा पानी का भारी घड़ा सिर पर रखकर लौटी, उसने नेवले के मुंह पर खून लगा देखा। खून देखकर शारदा का दिमाग सुन्न हो गया। उसके मन में केवल एक ही विचार आया कि इस जंगली जानवर ने उसके मासूम बच्चे को मार डाला है।
क्रोध, दुःख और पागलपन में आकर शारदा ने बिना सोचे-समझे पानी से भरा भारी घड़ा पूरी ताकत से नेवले के ऊपर फेंक दिया। पानी का वह भारी घड़ा सीधे नेवले के सिर पर लगा और वह वफादार जीव तड़प-तड़प कर वहीं शांत हो गया। उसने दम तोड़ते हुए भी अपनी मालकिन की तरफ एक दर्द भरी निगाह से देखा, जैसे पूछ रहा हो, “मां, मेरी क्या खता थी?”
सच्चाई का दर्दनाक अहसास और सीख
शारदा रोती-चिल्लाती हुई घर के अंदर भागी। लेकिन जैसे ही वह कमरे में पहुंची, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका बेटा पालने में चैन से सो रहा था और मुस्कुरा रहा था। पालने के ठीक नीचे एक बहुत बड़ा काला सांप मरा हुआ पड़ा था।
शारदा को अपनी भयानक भूल का अहसास हो चुका था। उसने अपने रक्षक को ही अपने हाथों से मार डाला था। वह दौड़कर बाहर आई और नेवले के बेजान शरीर को अपनी छाती से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
पंचतंत्र की इस कहानी से सीख
यह पंचतंत्र की नैतिक कहानी हमें यह सिखाती है कि “बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय।” अर्थात, गुस्से या जल्दबाजी में बिना सच जाने लिया गया कोई भी निर्णय हमेशा विनाशकारी होता है। किसी भी परिस्थिति में धैर्य रखना और सच को परखना बेहद जरूरी है।