एक जमाना था जब बॉलीवुड की कहानियों की आत्मा हमारे देश के गाँवों में बसती थी। ‘मदर इंडिया’, ‘लगान’ और ‘स्वदेश’ जैसी फिल्मों ने हमें अपनी मिट्टी की खुशबू से जोड़े रखा। लेकिन फिर आया वो दौर, जहाँ लंदन की सड़कें, चमचमाती गाड़ियां और स्विट्जरलैंड की बर्फ बॉलीवुड की पहली पसंद बन गईं। गाँव मानो मुख्यधारा के सिनेमा के नक्शे से पूरी तरह गायब ही हो गए। लेकिन ठहरिए! बड़े पर्दे के मेकर्स ने जिस भारतीय ग्रामीण परिवेश को ‘आउटडेटेड’ मानकर छोड़ दिया था, आज वही गाँव ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर राजा बनकर लौटे हैं।
विदेशी चकाचौंध से बोर हुए दर्शक, मिट्टी की सोंधी महक की हुई वापसी
जब बड़े पर्दे पर केवल एनआरआई (NRI) रोमांस और बड़े शहरों के कंक्रीट के जंगलों वाली कहानियाँ परोसी जाने लगीं, तो आम दर्शक कुछ असली और देसी देखने के लिए तरस गए। बॉलीवुड को लगा कि दर्शकों को सिर्फ आलीशान बंगले और बड़े सितारे ही पसंद आते हैं। इसी बीच एंट्री हुई ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की, जिसने दर्शकों की इस अधूरी चाहत को पहचाना। जहाँ बड़े-बड़े फिल्म मेकर्स करोड़ों रुपये खर्च करके विदेशी लोकेशंस पर शूटिंग कर रहे थे, वहीं डिजिटल क्रिएटर्स ने बहुत ही कम बजट में उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के गाँवों की पगडंडियों पर अपना कैमरा सेट कर दिया।
‘पंचायत’ और ‘मिर्जापुर’ ने सिखाया सफलता का नया देसी पाठ
जब ओटीटी पर ‘पंचायत’ वेब सीरीज रिलीज हुई, तो फुलेरा गाँव का ‘सचिव जी’ (जितेंद्र कुमार) और ‘प्रधान जी’ रातों-रात हर घर के चहेते बन गए। बिना किसी बड़े सुपरस्टार और बिना किसी तड़क-भड़क के, सिर्फ एक पानी की टंकी और लौकी के इर्द-गिर्द बुनी गई इस कहानी ने साबित कर दिया कि असली भारत आज भी हमारे गाँवों में ही धड़कता है। इसके बाद ‘मिर्जापुर’, ‘जामतारा’ और ‘गुल्लक’ जैसी सीरीज ने देसी लहजे, स्थानीय बोलियों और मिट्टी से जुड़े किरदारों के दम पर सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
पहले फिल्मों में गाँवों को केवल गरीबी, लाचारी या फिर जमींदारों के अत्याचार के चश्मे से ही दिखाया जाता था। लेकिन आज के डिजिटल मेकर्स ने गाँवों को केवल समस्या नहीं, बल्कि हास्य, बुद्धिमत्ता और बदलते वक्त के प्रतीक के रूप में पेश किया है।
काक-वाणी का साफ मानना है कि अब दर्शक बड़े सितारों के नकली चेहरों से ज्यादा इन जमीनी किरदारों से जुड़ाव महसूस करते हैं। ओटीटी की इस सफलता ने बॉलीवुड को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि मनोरंजन के लिए पेरिस या न्यूयॉर्क जाने की जरूरत नहीं है, असली खजाना तो हमारे अपने गाँवों की चौपालों में ही छिपा हुआ है।
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