बॉलीवुड में जब चॉकलेटी हीरो अपनी प्रेमिका के पीछे सरसों के खेतों में भाग रहे थे, तब एक बंदा अपनी कड़क आवाज, तीखी नजरों और तेज-तर्रार डायलॉग डिलीवरी से थिएटर के पर्दों पर आग लगा रहा था। जी हां, हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के सबसे अलहदा कलाकार नाना पाटेकर की! हाल ही में प्रसिद्ध ‘फ्रंटलाइन मैगजीन’ (Frontline Magazine) ने भारतीय सिनेमा में नाना पाटेकर और उनके ‘एंटी-हीरो’ (Anti-Hero) के सफर पर एक बेहतरीन लेख छापा है, जिसने बी-टाउन के गलियारों में नाना के उस सुनहरे दौर की यादें फिर से ताजा कर दी हैं।
जब ‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने’ ने हिला दिया था थिएटर!
हिंदी सिनेमा में जब भी एंटी-हीरो की बात होती है, तो लोग अक्सर ‘बाजीगर’ के शाहरुख खान या ‘शोले’ के गब्बर सिंह को याद करते हैं। लेकिन नाना पाटेकर का एंटी-हीरो अवतार एकदम अलग, ‘देसी और रॉ’ था। फिल्म ‘परिंदा’ का ‘अन्ना भाई’ याद है? जो आग से डरता भी था और पूरी मुंबई में खौफ का दूसरा नाम भी था। या फिर ‘क्रांतिवीर’ का वो आइकॉनिक क्लाइमेक्स सीन—“ये मुसलमान का खून है, ये हिंदू का खून है… बता इसमें से कौन सा मुसलमान का है?” इस एक सीन ने थिएटर में बैठे हर दर्शक के रोंगटे खड़े कर दिए थे। नाना ने यह साबित किया कि सिनेमा में छाने के लिए सिर्फ खूबसूरत चेहरा ही नहीं, बल्कि सीने में सुलगता हुआ गुस्सा भी काफी है।
न सिर्फ हीरो, न सिर्फ विलेन… ये हैं नाना ‘द एंटी-हीरो’!
‘काक-वाणी’ के बॉलीवुड लवर्स को बता दें कि एंटी-हीरो वो किरदार होता है जो भले ही कानून तोड़े या गुस्सा करे, लेकिन दर्शक फिर भी उससे नफरत नहीं कर पाते। नाना पाटेकर ने ‘अपहरण’, ‘तिरंगा’, ‘वजूद’ और ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ जैसी फिल्मों से एंटी-हीरो के इस फॉर्मूले को गढ़ा। वे न तो पूरी तरह सफेद (दूध के धुले) थे और न ही पूरी तरह काले (बुरे), वे तो उस ‘ग्रे-शेड’ के उस्ताद थे, जिन्हें देखकर थियेटर में सीटियां बजना तय होता था।
आज भी क्यों खास हैं नाना पाटेकर?
आजकल के दौर में भले ही फिल्मों में बड़े-बड़े वीएफएक्स (VFX) और भारी-भरकम बजट का इस्तेमाल होता हो, लेकिन नाना पाटेकर के अभिनय का वो कड़क अंदाज आज भी मिसिंग लगता है। फ्रंटलाइन मैगजीन का यह विश्लेषण हमें याद दिलाता है कि असली स्टारडम चेहरे से नहीं, बल्कि अभिनय की गहराई से आता है। काक-वाणी का तो बस यही कहना है—नाना जैसा ‘एंटी-हीरो’ न कोई था, और न कभी होगा!
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