भारत में गिनती की जंग: बंदे कम, दावे अरबों में!

जब अमेरिका की प्रसिद्ध ‘टाइम मैगजीन’ ने छापा कि “भारत में इस बात की जंग छिड़ी है कि किसे गिना जाए”, तो हमारे देश के नेताओं की बांछें खिल गईं। आखिर विदेशी गोरे साहबों ने भी मान लिया कि हम गिनती के खेल में कितने बड़े उस्ताद हैं! वैसे भी हमारे देश में गिनती विकास का हिसाब लगाने के लिए नहीं, बल्कि यह तय करने के लिए होती है कि अगली बार किसकी कुर्सी किस पाए पर टिकेगी।

गिनती इंसान की या सिर्फ वोट बैंक की?

आजकल हमारे देश का सबसे लोकप्रिय राष्ट्रीय खेल है—’गिनती-गिनती’। विपक्ष के हमारे जननायक राहुल गांधी का बस चले तो वे राह चलते हर आदमी को रोककर उसकी जेब से जाति प्रमाण पत्र निकालकर गिनना शुरू कर दें। उनके हिसाब से देश की हर बीमारी की एक ही खुराक है—जातीय जनगणना! बेरोजगारी बढ़ रही है? जाति गिनो! महंगाई आसमान पर है? जाति गिनो! शायद उनका मानना है कि सड़क के गड्ढों की जाति पता चल जाए, तो वे अपने आप भर जाएंगे।

दूसरी तरफ हमारी सत्तारूढ़ भाजपा का गणित थोड़ा दिव्य है। वे 2021 से होने वाली वास्तविक जनगणना को ऐसे टाल रहे हैं जैसे कोई छात्र परीक्षा का टाइमटेबल आगे बढ़ने की मन्नत मांगता है। उनके कैलकुलेटर में गिनती का मतलब अलग है—कितने घुसपैठिए आए, कितने मुफ्त राशन पाने वाले लाभार्थी बने और कितने लोग केवल भाषण सुनकर बटन दबाएंगे। जब तक संख्या अपने मनमाफिक न बैठे, तब तक जनगणना का पर्चा दबाकर रखना ही सबसे श्रेष्ठ कूटनीति है।

कागजों का भारत और कुर्सी का गणित

‘काक-वाणी’ की मुंडेर से अगर इस तमाशे को देखें, तो समझ आता है कि इस देश में आम आदमी को तीन अलग-अलग मौकों पर गिना जाता है। पहली बार करदाता के रूप में (निचोड़ने के लिए), दूसरी बार चुनाव में वोट के रूप में (छलने के लिए), और तीसरी बार राशन की कतार में (एहसान जताने के लिए)। लेकिन जब उसे बेहतर शिक्षा, रोजगार या अस्पताल में बेड देने की बारी आती है, तो सरकार और विपक्ष दोनों का गणित अचानक कमजोर हो जाता है।

टाइम मैगजीन वाले सीधे-सादे गोरे लोग हैं, वे क्या समझें कि भारत में गिनती केवल संख्या नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी है। इस ‘गिनती की जंग’ में आम नागरिक तो बस वह दर्शक है, जिसे हर पांच साल में सिर्फ इसलिए गिना जाता है ताकि राजनेताओं की गिनती सही बनी रहे!


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कागा जी