‘मतदाता सूची’ का खौफ: जब नाम साफ हों, तो लोकतंत्र की हत्या तय है!

अरे भइया! देश में लोकतंत्र एक बार फिर आईसीयू में भर्ती होने की कगार पर पहुंच गया है। वजह? कोई तानाशाही फरमान नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की वह दुस्साहसिक गुस्ताखी, जिसमें वह मतदाता सूची को दुरुस्त करने का काम कर रहा है। बीबीसी की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि राहुल गांधी और उनका ‘महा-गठबंधन’ इस वोटर रोल रिवीजन के खिलाफ लामबंद हो रहा है। आखिर किसी की हिम्मत कैसे हुई फर्जी, स्थानांतरित या परलोक सिधार चुके मतदाताओं के नाम काटने की? यह तो सीधे-सीधे विपक्ष के पारंपरिक वोट बैंक पर हमला है!

जब ईवीएम थकी, तो वोटर लिस्ट बनी नई विलेन

काक-वाणी के तीखे चश्मे से देखें, तो चुनाव हारने की ‘अग्रिम बुकिंग’ कराने में हमारे विपक्षी सूरमाओं का कोई मुकाबला नहीं है। जब ईवीएम हैक होने वाली घिसी-पिटी कहानी पर जनता ताली बजाना बंद कर देती है, तो पटकथा में तुरंत एक नया विलेन लाया जाता है—’मतदाता सूची संशोधन’। राहुल जी की दिव्य दृष्टि का मानना है कि मतदाता सूची में से नाम हटना केवल एक प्रशासनिक सफाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र का महा-अपराध है। आखिर अगर कागजों पर बसे ‘अदृश्य वोटरों’ का नाम हटा दिया जाएगा, तो चुनाव नतीजों वाले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलने के लिए नए बहाने कहां से आएंगे?

लिस्ट में सुधार या हार का अग्रिम बहाना?

अब देखिए, चुनाव आयोग की बेवकूफी तो देखिए! वह चाहता है कि जो लोग अब इस दुनिया में नहीं रहे, उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया जाए। लेकिन विपक्ष का दार्शनिक तर्क शायद यह है कि ‘स्वर्गवासी मतदाता’ भी उनके प्रति निष्ठावान हो सकते हैं, इसलिए उनका नाम सूची में अमर रहना चाहिए! लोकतंत्र की असली खूबसूरती तो इसी में है कि वोटर रहे न रहे, उसका वोट सही बक्से में गिरना चाहिए।

जनता को भी अब यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि चुनाव जीतना किसी विचार या जमीनी काम का खेल नहीं है, यह तो बस ‘लिस्ट’ का खेल है। अगर चुनाव हार गए, तो मतदाता सूची में गड़बड़ी थी; और अगर गलती से कहीं जीत गए, तो जनता ने तानाशाही को उखाड़ फेंका! काक-वाणी की मुफ्त सलाह है कि राहुल जी को एक स्थायी अर्जी ड्राफ्ट करवा लेनी चाहिए—”जब-जब चुनाव आएँ, तब-तब हर चुनावी प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।” क्योंकि जब अपनी तैयारी शून्य हो, तो निष्पक्ष मतदाता सूची भी सबसे बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र नजर आने लगती है।


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कागा जी