मिट्टी का सच: जीवन की सबसे बड़ी सीख

बहुत समय पहले, नर्मदा नदी के तट पर बसे एक शांत गांव में सोमदेव नाम का एक अत्यंत कुशल मूर्तिकार रहता था। सोमदेव की हाथों में जादू था। उसकी बनाई पत्थर और मिट्टी की मूर्तियां इतनी जीवंत लगती थीं कि पहली नज़र में कोई भी धोखा खा जाता था। सोमदेव को अपनी इस अद्भुत कला पर बहुत गर्व था, लेकिन जैसे-जैसे उसकी उम्र ढलने लगी, उसे मृत्यु का भय सताने लगा। वह जानता था कि एक दिन उसका अंत निश्चित है, लेकिन वह किसी भी कीमत पर काल को छलना चाहता था।

काल को छलने की योजना

एक रात सोमदेव को अंतरात्मा से आभास हुआ कि यमदूत शीघ्र ही उसके प्राण लेने आने वाले हैं। प्राण गंवाने के डर से व्याकुल होकर उसने एक अनोखी तरकीब सोची। उसने दिन-रात एक करके अपने ही रूप-रंग की दस हूबहू मूर्तियां तैयार कर लीं। मूर्तियां इतनी निपुणता से बनी थीं कि असली और नकली सोमदेव में फर्क करना नामुमकिन था। जब यमदूत के आगमन का समय हुआ, तो सोमदेव उन दस मूर्तियों के बीच बिल्कुल स्थिर और सांस रोककर खड़ा हो गया।

यमदूत की दुविधा और चतुर चाल

जब यमदूत सोमदेव के कक्ष में पहुंचे, तो वहां एक ही शक्ल-सूरत के ग्यारह सोमदेव मौजूद थे। यमदूत असमंजस में पड़ गए। वे सोचने लगे कि इनमें से जीवित मनुष्य कौन सा है और बेजान मूर्तियां कौन सी हैं? यमदूत किसी बेजान मूर्ति को नहीं ले जा सकते थे और न ही खाली हाथ लौट सकते थे।

यमदूत मनुष्य के मनोविज्ञान को अच्छी तरह जानते थे। वे समझ गए कि इंसान अपनी कला और रचना से सबसे ज्यादा मोह रखता है। यमदूत ने मूर्तियों को गौर से देखा और गहरी सांस लेकर दुखी स्वर में बोले, “वाह! क्या अद्भुत कारीगरी है। ये मूर्तियां तो बिल्कुल सजीव प्रतीत होती हैं। लेकिन अफसोस! इस मूर्तिकार ने एक बहुत बड़ी गलती कर दी। यदि वह मूर्तिकार आज मेरे सामने होता, तो मैं उसे उसकी यह अक्षम्य भूल जरूर बताता।”

अहंकार का पतन और जीवन का सच

अपनी जीवन भर की तपस्या और कला में ‘गलती’ शब्द सुनते ही सोमदेव का अहंकार उबल पड़ा। वह भूल गया कि वह यमदूत से अपनी जान छिपा रहा है। अपनी रचना में दोष सुनना उसके स्वाभिमान के खिलाफ था। वह तुरंत मूर्तियों के बीच से चिल्लाकर बाहर आया, “गलती? असंभव! मेरी बनाई मूर्तियों में कोई गलती नहीं हो सकती। बताओ, क्या कमी है मेरी कला में?”

यमदूत के चेहरे पर एक शांत मुस्कान आ गई। उन्होंने सोमदेव की कलाई पकड़ी और करुणा भरे स्वर में कहा, “बस यही एक गलती सोमदेव—तुम्हारा अहंकार। तुम अपनी कला से मृत्यु को तो धोखा दे गए, लेकिन अपने भीतर छिपे घमंड से हार गए।” सोमदेव की आंखों से आंसू बह निकले। उसे अहसास हुआ कि इंसान चाहे कितना भी महान क्यों न बन जाए, वह ईश्वर की बनाई इस सृष्टि के नियमों और मृत्यु के परम सत्य से परे नहीं जा सकता।

कहानी की सीख

सीख: यह जीवन का सच बताने वाली लोककथा हमें यह सिखाती है कि मृत्यु और नश्वरता ही इस जीवन का अंतिम सत्य है। इंसान का ज्ञान, धन या कला उसे अमर नहीं बना सकते। जब तक इंसान के भीतर ‘मैं’ और ‘अहंकार’ जीवित रहता है, तब तक वह सांसारिक बंधनों में भटकता रहता है। सत्य को स्वीकार करना और विनम्रता से जीना ही जीवन का वास्तविक मर्म है।

कागा जी