मुसाफिरखाना या महल: जीवन की आँखें खोलने वाली एक भावुक कहानी

एक राजा का अहंकार और साधु का आगमन

बहुत समय पहले की बात है, एक बेहद प्रतापी और समृद्ध राजा था। उसके पास धन, वैभव, विशाल सेना और एक बेहद आलीशान महल था। राजा को अपनी इन सांसारिक उपलब्धियों पर बहुत घमंड था। वह मानता था कि उसकी यह सल्तनत और उसका यह वैभव अमर है। वह प्रजा के सुख-दुख से बेखबर अपनी ही दुनिया में मस्त रहता था।

एक दिन, फटे-पुराने कपड़े पहने एक तेजस्वी साधु सीधे राजा के दरबार में दाखिल हुआ। उसने बिना किसी डर या झिझक के राजा के मुख्य सिंहासन की ओर कदम बढ़ाए और वहीं ज़मीन पर अपनी चादर बिछाकर सोने की तैयारी करने लगा। राजा के पहरेदार उसे रोकने ही वाले थे कि राजा ने उसे देख लिया।

राजा ने अत्यंत क्रोधित होकर चिल्लाते हुए पूछा, “हे भिक्षुक! तुम बिना अनुमति के मेरे इस भव्य राजदरबार में कैसे चले आए? और तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम मेरे महल को धर्मशाला समझकर यहाँ विश्राम करने जा रहे हो?”

महल या मुसाफिरखाना?

साधु के चेहरे पर तनिक भी भय नहीं था। वह मंद-मंद मुस्कुराया और अत्यंत शांत स्वर में बोला, “हे राजन! मुझे क्षमा करें। दरअसल, मैं तो इसे एक मुसाफिरखाना (सराय) समझकर यहाँ रात बिताने चला आया था।”

साधु की बात सुनकर राजा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। राजा बोला, “क्या तुम अंधे हो? यह मेरा अभेद्य और आलीशान महल है, जिसे मेरे पूर्वजों ने बड़ी मेहनत से बनवाया था। यह कोई सराय नहीं है जहाँ कोई भी मुसाफिर आकर ठहर जाए!”

साधु ने बड़ी ही विनम्रता से राजा से कहा, “राजन, क्रोध शांत करें। मैं आपसे कुछ बेहद साधारण सवाल पूछना चाहता हूँ। क्या आप मुझे उनके उत्तर देंगे?” राजा ने झल्लाते हुए कहा, “ठीक है, पूछो!”

साधु ने पूछा, “राजन, इस महल में आपसे पहले कौन रहता था?”

राजा ने गर्व से सीना तानकर कहा, “मेरे पूज्य पिताजी।”

साधु ने फिर पूछा, “और उनसे पहले यहाँ कौन रहता था?”

राजा ने उत्तर दिया, “मेरे दादाजी।”

साधु ने अंतिम सवाल किया, “और अब वे दोनों कहाँ हैं?”

यह सवाल सुनते ही राजा के चेहरे की चमक फीकी पड़ गई। उसने भारी मन और धीमी आवाज़ में कहा, “वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। वे दोनों स्वर्ग सिधार चुके हैं।”

जीवन का सबसे बड़ा और अंतिम सच

साधु की आँखों में एक गहरी करुणा उभर आई। उसने राजा के कंधे पर अपना हाथ रखा और बड़े ही स्नेह से कहा, “हे राजन! अब खुद ही विचार कीजिए। जिस स्थान पर आपके दादाजी कुछ समय रहे और चले गए, फिर आपके पिताजी कुछ वर्ष रहे और चले गए। अब आप यहाँ कुछ समय के लिए मेहमान हैं, और कल आपकी आने वाली पीढ़ी यहाँ रहेगी और आप भी चले जाएँगे। तो क्या यह जगह एक मुसाफिरखाना नहीं हुई, जहाँ लोग केवल कुछ समय के लिए ठहरते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं?”

साधु के इन शब्दों ने राजा के हृदय पर सीधा प्रहार किया। राजा की आँखों से अश्रुधारा बह निकली। उसका सारा अहंकार पल भर में हवा हो गया। उसे समझ आ गया कि जिस महल, संपत्ति और शरीर पर वह गर्व कर रहा था, वह सब क्षणभंगुर है।

कहानी से सीख

सीख: इस प्रसिद्ध लोककथा से हमें यह अमूल्य सीख मिलती है कि यह संसार एक मुसाफिरखाना है और हम सभी यहाँ कुछ समय के लिए आए मेहमान हैं। यहाँ की कोई भी भौतिक वस्तु स्थायी नहीं है। इसलिए धन, संपत्ति या पद का अहंकार करना व्यर्थ है। जीवन का असली सच यही है कि खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाना है; केवल हमारे अच्छे कर्म और दूसरों की सेवा ही यहाँ हमारी याद बनकर जीवित रहती है।

कागा जी