द इंडियन एक्सप्रेस की एक हालिया रिपोर्ट ने हमारे देश के कर्मठ, ईमानदार और दिन-रात जनता की ‘सेवा’ में दुबले होते राजनेताओं की रातों की नींद उड़ा दी है। रिपोर्ट कहती है कि भारत का युवा वोटर अब राजनीतिक दलों से दूर हो रहा है। अरे भाई, यह तो सरासर गद्दारी है! जिस देश का युवा सोशल मीडिया पर दिन-रात अपने पसंदीदा नेता के लिए कमेंट बॉक्स में युद्ध लड़ने को तैयार रहता था, वह अचानक इतना समझदार कैसे हो गया? यह हमारे लोकतंत्र की रीढ़ यानी ‘चुनावी नौटंकी’ पर सीधा हमला है।
आईटी सेल और रैलियों का क्या होगा, भाई?
हमारे नेताओं ने युवाओं के लिए क्या नहीं किया? उनके सुनहरे भविष्य के लिए चुनावी रैलियों में मुफ्त की बिरयानी, चमकीली टोपियां और दो सौ रुपये की दिहाड़ी का पुख्ता इंतजाम किया। उन्हें दिन-रात नफरत की डिबेट में व्यस्त रखने के लिए ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के मुफ्त कोर्स शुरू करवाए। लेकिन आज का युवा कितना स्वार्थी हो गया है! वह रैलियों में झंडा उठाकर नारे लगाने के बजाय लाइब्रेरी में बैठकर नौकरी की तैयारी कर रहा है। अगर सब पढ़-लिखकर समझदार हो जाएंगे, तो हमारे परम आदरणीय नेताओं के खोखले भाषणों पर तालियां कौन बजाएगा? आधी रात को विपक्ष के नेताओं को ट्रोल करने का राष्ट्रीय कर्तव्य कौन निभाएगा?
रोजगार और शिक्षा जैसी ‘फालतू’ मांगें
इस नई पीढ़ी की मांगें भी कितनी अजीब और अव्यावहारिक हैं। इन्हें ‘रोजगार’ चाहिए, ‘गुणवत्तापूर्ण शिक्षा’ चाहिए और ‘सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं’ चाहिए। कोई इनसे पूछे कि क्या इन मामूली चीजों से देश का नाम रोशन होता है? असली विकास तो चुनाव के समय होने वाले भव्य रोड शो और धर्म-जाति के समीकरणों में छिपा है। हमारे नेताजी रात-दिन सोचकर थक गए कि युवाओं को मुफ्त का 5G डेटा देकर रील बनाने में कैसे व्यस्त रखा जाए, और ये युवा हैं कि बार-बार परीक्षा के पेपर लीक होने का रोना रो रहे हैं। अरे भाई, पेपर लीक होना तो तुम्हारी सहनशक्ति की परीक्षा है, इसे सकारात्मक रूप से क्यों नहीं लेते?
काक-वाणी का कड़वा सच
हमारा मानना है कि युवाओं का यह मोहभंग नेताओं की गलती नहीं, बल्कि युवाओं की ‘मतिभ्रष्ट’ होने का सबूत है। राजनीति से दूर रहकर वे देश के सबसे बड़े मनोरंजन उद्योग (यानी चुनावी वादों) का मजा खो रहे हैं। हमारी नेताओं को मुफ्त सलाह है कि वे तुरंत ‘युवा घर वापसी’ योजना शुरू करें, जिसमें रैलियों में आने वाले हर युवा को मुफ्त वाई-फाई और एक कड़क चाय की गारंटी दी जाए। वरना, अगर देश का युवा सचमुच जाग गया और पढ़ाई-लिखाई के दम पर सवाल पूछने लगा, तो हमारे नेताओं को भी सचमुच काम करना पड़ जाएगा—जो कि भारतीय राजनीति के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी होगी!
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