मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने एक बार फिर अपने ज्ञान के झोले से एक चमचमाता हुआ सच निकाला है। उन्होंने अपने ताजा ज्ञान-प्रवचन में फरमाया है कि पिछले 120 वर्षों से भारतीय छात्र देश की राजनीति और सार्वजनिक जीवन को बदलने के लिए लड़ रहे हैं। धन्य हो इतिहासकार महोदय! हम तो अब तक अज्ञानता के अंधेरे में जी रहे थे और सोचते थे कि छात्र कॉलेज सिर्फ डिग्री लेने, प्लेसमेंट पाने या कैंटीन में समोसे चबाने जाते हैं। लेकिन गुहा जी के इस खुलासे के बाद हमारी आंखें खुल गई हैं। अब जाकर समझ आया कि सेमेस्टर परीक्षाओं में जो छात्र फेल होते हैं, वे दरअसल फेल नहीं हो रहे होते, बल्कि वे देश के लोकतंत्र को पास कराने की बड़ी लड़ाई में व्यस्त होते हैं!
क्रांति का सिलेबस और नेताजी की ट्रेनिंग
गुहा जी के ऐतिहासिक चश्मे से देखें तो भारत का हर छात्र सुबह उठकर ब्रश करने के बाद सबसे पहले यही सोचता है कि आज देश की राजनीति को किस तरह सुधारा जाए। कॉलेज के गेट पर ताला लगाना, कुलपति का घेराव करना और हॉस्टल के खराब खाने पर प्रदर्शन करना—ये सब दरअसल ‘सार्वजनिक जीवन में सुधार’ के महान क्रांतिकारी कदम हैं। हमारे देश के छात्र नेताओं के लिए कॉलेज कैंपस केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि एक ‘प्री-प्लेसमेंट सेल’ है, जहां से वे सीधे किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता बनने की ट्रेनिंग पाते हैं। 120 सालों से चल रही इस महान परंपरा ने हमें कई ऐसे दिग्गज नेता दिए हैं जो आज देश को टीवी डिबेट्स में अपनी चीखों से ‘सुधार’ रहे हैं।
इतिहासकार की पुरानी दूरबीन और आज का रील युग
रामचंद्र गुहा साहब अक्सर इतिहास की धूल झाड़ने में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें आज के छात्रों की असली ‘क्रांति’ दिखाई ही नहीं देती। आज का छात्र राजनीति बदलने के लिए केवल लाठियां नहीं खाता, बल्कि इंस्टाग्राम पर रील्स भी बनाता है। आज का संघर्ष ‘फॉलोअर्स’ और ‘लाइक्स’ के लिए है। गुहा जी, आज का छात्र अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई नहीं लड़ रहा, वह तो बस परीक्षा के सिलेबस और कम इंटरनेट स्पीड से आजादी चाहता है। लेकिन हमारे बुद्धिजीवियों की यह खूबी है कि वे कॉलेज की कैंटीन में हुई दो गुटों की हाथापाई को भी ‘फासीवाद के खिलाफ वैचारिक संघर्ष’ घोषित कर देते हैं।
तो चलिए, गुहा जी के इस महान शोध के बाद हम भी देश के तमाम बैकबेंचर्स और क्लास बंक करने वाले छात्रों को सलाम करते हैं। वे क्लास में नहीं हैं, क्योंकि वे बाहर इतिहास रच रहे हैं। अगली बार जब आपका बच्चा परीक्षा में फेल हो जाए, तो उसे डांटिएगा मत। हो सकता है वह रामचंद्र गुहा के सपनों का भारत बनाने के लिए 120 साल पुराने आंदोलन को आगे बढ़ा रहा हो!
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