अरे वाह! भारतीय राजनीति के रंगमंच पर एक और भव्य नाटक का मंचन शुरू हो चुका है। जब संसद में नारे लगाकर गला सूख गया और सड़कों पर झंडे लहराकर हाथ थक गए, तो हमारे परम आदरणीय जननायकों को अचानक याद आया कि देश में एक सुप्रीम कोर्ट भी है! ‘काक-वाणी’ के सभी सुधी पाठकों का स्वागत है राजनीति के इस नए ‘पॉलीटिकल फिटनेस क्लब’ में। BBC की खबर है कि राहुल गांधी और उनके ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के शूरवीर अब सुप्रीम कोर्ट की ओर पैदल मार्च निकाल रहे हैं।
संसद से सुप्रीम कोर्ट: लोकतंत्र की अनोखी मैराथन
अब मुख्य सवाल यह उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट का मुख्य द्वार केवल न्याय के लिए है, या फिर राजनेताओं के ‘फोटो-ऑप’ (Photo-Op) के लिए भी आरक्षित कर दिया गया है? हमारे राहुल जी को चलने का बहुत शौक है। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ से उनके जूतों को जो आदत पड़ी है, वह अब उन्हें खींचकर सुप्रीम कोर्ट के लॉन तक ले आई है। जब-जब देश में लोकतंत्र खतरे में आता है, हमारे विपक्षी नेता तुरंत अपने सबसे महंगे और आरामदायक स्नीकर्स पहनते हैं, कैमरों को सही एंगल पर सेट करवाते हैं और टहलना शुरू कर देते हैं। वाह! लोकतंत्र बचाने का क्या नायाब वैज्ञानिक तरीका है—इधर नेता जी दो किलोमीटर चले, उधर लोकतंत्र खतरे से बाहर!
न्यायपालिका भी सोचेगी—’ये कौन सा नया केस है?’
सुप्रीम कोर्ट के आदरणीय जज साहब भी अपने चेम्बर में चाय की चुस्की लेते हुए यही सोच रहे होंगे कि ‘अरे भाई, याचिका (Petition) दायर करने का नियम तो कागजों पर होता था, यह पूरा का पूरा राजनीतिक जुलूस ही अंदर चला आ रहा है!’ गठबंधन के नेताओं की इस अद्भूत एकता को देखकर तो लगता है कि जैसे ही वे कोर्ट के गेट पर पहुंचकर एक सामूहिक तस्वीर खिंचवाएंगे, देश की सारी समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो जाएंगी। राहुल जी और उनके सहयोगी ऐसे कदमताल कर रहे हैं मानो सुप्रीम कोर्ट कोई अदालत नहीं, बल्कि किसी ‘पॉलीटिकल वॉकथॉन’ का फिनिशिंग पॉइंट हो।
विरोध का नया ‘ट्रेंड’: न दलील, न अपील, बस केवल टहलना!
पुराने ज़माने में विरोध जताने के लिए बहस होती थी, नीतिगत तर्क दिए जाते थे। लेकिन नए दौर की आधुनिक राजनीति में विरोध का सीधा सा मतलब है—‘कैमरा ऑन करो, फीते कसो और चलो सुप्रीम कोर्ट!’ अगर यही चलन जारी रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब यह गठबंधन चुनाव आयोग, मौसम विभाग और नासा के दफ्तरों के बाहर भी ‘मॉर्निंग वॉक’ करता हुआ पाया जाएगा।
‘काक-वाणी’ की अंतिम कांव-कांव
काक-वाणी का तो सीधा गणित है—अगर केवल पैदल मार्च करने से ही देश की समस्याएं सुलझ जातीं, तो आज देश का सबसे सफल नेता कोई ओलंपिक एथलीट होता। खैर, इस ‘सुप्रीम वॉक’ से नेताओं को मुफ्त की पब्लिसिटी मिल गई, मीडिया को शाम की टीआरपी मिल गई और सुरक्षाकर्मियों को बिना वजह की ओवरटाइम ड्यूटी! आम जनता बस यही सोच रही है कि अगले हफ्ते लोकतंत्र को बचाने के लिए ये नेता जी किस पार्क में टहलने जाएंगे!
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