वाह! क्या अद्भुत और अत्यंत गंभीर विश्लेषण है। ‘द हिंदू’ अखबार के परम ज्ञानी बुद्धिजीवियों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे देश के सबसे बड़े खोजी पत्रकार हैं। उन्होंने सदियों की तपस्या के बाद यह खोज निकाला है कि भारत की विपक्षी राजनीति में ‘गांधी’ का फिर से उदय (Re-emergence) हो रहा है। कमाल है! हमें तो लगा था कि वे पिछले दो दशकों से यहीं थे, हर छह महीने में खुद को ‘लॉन्च’ और ‘री-लॉन्च’ कर रहे थे। लेकिन बुद्धिजीवियों के चश्मे से देखें, तो यह कोई साधारण री-पैकेजिंग नहीं, बल्कि एक ‘वैचारिक पुनर्जागरण’ है।
लॉन्चिंग, री-लॉन्चिंग और री-ब्रांडिंग का अनंत चक्र
काक-वाणी के पाठकों को अच्छी तरह याद होगा कि हमारे प्यारे राहुल बाबा का राजनीतिक करियर किसी ऐसे बॉलीवुड स्टार किड जैसा रहा है, जिसकी हर फ्लॉप फिल्म के बाद पीआर टीम चिल्लाती है—”इस बार स्क्रिप्ट अलग है, वह बिल्कुल नए अवतार में आ रहे हैं!” कभी वे दाढ़ी बढ़ाकर दार्शनिक बन जाते हैं, तो कभी सफेद टी-शर्ट पहनकर मैराथन धावक। ‘द हिंदू’ जैसे कुलीन अखबार इन बदलावों पर इतने भारी-भरकम और क्लिष्ट शब्द लिखते हैं कि बेचारा आम वोटर डिक्शनरी ढूंढने लगता है। ‘सहानुभूति का नया व्याकरण’, ‘विपक्ष की नई धुरी’, ‘जनांदोलन का नया चेहरा’—अहा! इन भारी शब्दों को सुनकर ही ऐसा लगता है मानो विपक्ष सीधे स्वर्ग से उतरकर सीधे सत्ता की कुर्सी पर बैठने वाला है।
‘गांधी’ ब्रांड का नया सीजन: ओटीटी से भी तेज रीलीज़
विपक्ष की सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि उनके पास ‘गांधी’ के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इसलिए, जब भी चुनाव के नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आते, तो ‘गांधी ब्रांड’ का एक नया सीजन बाजार में उतार दिया जाता है। इस बार के ‘पुनर्जन्म’ का श्रेय उनकी लंबी पैदल यात्राओं और संसद में दिए गए भाषणों को दिया जा रहा है। बुद्धिजीवी वर्ग इस बात पर मुग्ध है कि कैसे एक राजकुमार ने खुद को अचानक ‘जनता का मसीहा’ घोषित कर दिया है। भले ही चुनाव के असल परिणाम कुछ और ही कहानी बयां करते हों, लेकिन अखबारों के पन्नों पर यह नया वर्जन सुपरहिट घोषित हो चुका है।
अंत में, काक-वाणी तो यही कहेगी कि भारतीय लोकतंत्र का यह वह अद्भुत तमाशा है जहाँ बिना किसी ठोस जनाधार के भी ‘महान पुनरागमन’ का ढोल पीटा जा सकता है। अब देखना यह है कि यह नया अवतार कितने दिन टिकता है, या फिर अगले चुनाव के बाद हमें फिर से “अंडरस्टैंडिंग गांधीज री-री-इमर्जेंस” शीर्षक वाला नया लेख पढ़ना पड़ेगा। आखिर, लोकतंत्र में मनोरंजन का यह सिलसिला चलते रहना चाहिए!
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