रील्स के ‘क्रांतिकारी’ और द प्रिंट का ज्ञान: जब भारत का जेन-जी बिना वाई-फाई के ‘महाक्रांति’ करने निकला!

वाह! ‘द प्रिंट’ के कलमकारों ने क्या गहरा और मर्मस्पर्शी शोध किया है। उन्होंने खोज निकाला है कि भारत का ‘जेन-जी’ (Gen Z) आजकल मंदिरों में माथा टेकने और प्रार्थना करने के बजाय सड़कों पर ‘लड़ाई’ लड़ रहा है। यह लड़ाई इतनी बड़ी, इतनी ऐतिहासिक है कि इसके सामने देश की मुख्यधारा की राजनीति भी बौनी पड़ गई है। ‘काक-वाणी’ इस क्रांतिकारी खुलासे से बेहद गद्गद है। अब तक हम अज्ञानी सोच रहे थे कि हमारे देश का युवा सुबह उठकर केवल ‘रील्स’ स्क्रॉल करता है और ‘एस्थेटिक’ कॉफी की तस्वीरें पोस्ट करता है, लेकिन द प्रिंट ने हमारी आंखें खोल दीं। वह तो असल में समाजवाद और लोकतंत्र की नई परिभाषा लिख रहा है, वह भी केवल 15 सेकंड के वीडियो में!

इंस्टाग्राम से इंकलाब तक का ‘कठिन’ सफर

इस महान रिपोर्ट के अनुसार, आज का युवा प्रार्थना नहीं कर रहा, वह संघर्ष कर रहा है। अब जरा इस संघर्ष के हथियारों को भी देख लीजिए। इनके हथियार हैं—’कूल’ दिखने वाली तख्तियां, जिन पर अंग्रेजी के बड़े ही काव्यात्मक और दिल को छू लेने वाले नारे लिखे होते हैं। उदाहरण के लिए—”माई मस्कारा इज़ टू एक्सपेंसिव टू क्राई ओवर दिस गवर्नमेंट” (मेरी सरकार विरोधी आंसुओं के लिए मेरा मस्कारा बहुत महंगा है)। वाह! क्या इंकलाब है! भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन देश में क्रांति इतनी ‘फैशनेबल’ और पाउट-फ्रेंडली हो जाएगी। अगर आंदोलन की जगह पर इंटरनेट की स्पीड थोड़ी कम हो जाए, तो शायद यह क्रांति वहीं दम तोड़ दे, लेकिन जब तक 5G चालू है, तब तक हमारा जेन-जी देश बचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

विपक्ष की नई ‘डिजिटल’ बैसाखी

इस अद्भुत खुलासे के बाद देश के विपक्ष की बांछें खिल गई हैं। विपक्षी नेताओं को लग रहा है कि अब उन्हें धूप में निकलकर जनता के बीच पसीना बहाने की कोई जरूरत नहीं है। बस एक बढ़िया सा इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर हायर कर लो, जो सरकार विरोधी मीम्स बना सके, और सत्ता की चाबी अपने आप हाथ में आ जाएगी। विपक्ष को पूरा भरोसा है कि जो युवा पोलिंग बूथ पर लंबी लाइन और धूप के डर से वोट डालने नहीं जाता, वह कम से कम एक्स (ट्विटर) पर हैशटैग चलाकर सरकार तो गिरा ही देगा। बुद्धिजीवियों को भी एक नया खिलौना मिल गया है। वे डाइनिंग टेबल पर बैठकर इस बात का विश्लेषण कर रहे हैं कि कैसे चाय की चुस्कियों के बीच ‘कंसेंट’, ‘गैसलाइटिंग’ और ‘टॉक्सिसिटी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके पूरा सिस्टम बदला जा सकता है।

वैसे, इस ‘फाइटिंग’ जेन-जी की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं पुलिस की लाठी या पानी की बौछार से उनके महंगे आईफोन का स्क्रीन न टूट जाए। लेकिन बुद्धिजीवी खुश हैं कि युवा आखिरकार ‘जाग’ गया है, चाहे वह दोपहर को सोकर उठा हो। अंत में, काक-वाणी द प्रिंट के इस क्रांतिकारी विश्लेषण को सादर नमन करती है। प्रार्थना छोड़िए, फोन उठाइए और संघर्ष कीजिए! बस संघर्ष की फोटो पर ‘विंटेज फिल्टर’ लगाना मत भूलिएगा, वरना क्रांति अधूरी रह जाएगी!</p


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कागा जी