रील्स, रिज़ और रायता: जब ‘जेन-ज़ी’ के सामने नतमस्तक हुआ हमारे बुज़ुर्ग नेताओं का ‘एंटायर पॉलिटिकल साइंस’

वाह! क्या क्रांतिकारी बदलाव है। कल तक जो भारतीय राजनेता देश के युवाओं को ‘भटके हुए नौजवान’ कहकर अपनी उबाऊ सभाओं में उपदेश झाड़ते थे, आज वे खुद इंस्टाग्राम रील्स पर अपनी ‘वाइब’ चेक करवा रहे हैं। ‘द वायर’ की इस रिपोर्ट ने हमारी बूढ़ी हो चुकी राजनीति की उस दुखती नब्ज पर हाथ रख दिया है, जिसे देखकर हंसी भी आती है और तरस भी। भारतीय राजनीति अब रैलियों के मैदान से उठकर स्मार्टफोन की 6 इंच की स्क्रीन में सिमट गई है, जहां असली राजा वह नहीं जो संसद में दहाड़े, बल्कि वह है जिसका वीडियो ‘ट्रेंडिंग ऑडियो’ पर लाख व्यूज बटोर ले।

सत्तर की उम्र में ‘रिज़’ ढूंढते हमारे माननीय

ज़रा कल्पना कीजिए, हमारे अस्सी साल के परम आदरणीय नेताजी, जो कल तक ‘समाजवाद’ और ‘राष्ट्रवाद’ के लंबे-चौड़े भाषणों से जनता को सुलाया करते थे, आज सुबह-सुबह अपने 21 वर्षीय सोशल मीडिया मैनेजर से पूछ रहे हैं, “बेटा, ये ‘सिग्मा मेल’ बनने के लिए चेहरे पर कौन सा ट्रांजिशन डालना पड़ेगा?” पारंपरिक राजनीति के सारे चाणक्य अब धरे के धरे रह गए हैं। अब नीतिशास्त्र पर चर्चा नहीं होती, अब तो रील्स पर ‘आई कैचिंग’ कट्स लगते हैं। सत्तर पार के नेताजी जब कैमरे के सामने अचानक सफेद कुर्ते से सीधे मोदी-जैकेट और काले चश्मे में कूदते हैं, तो समझ आता है कि देश का लोकतंत्र वाकई कितना ‘कूल’ और परिपक्व हो चुका है।

मैनिफेस्टो गया तेल लेने, अब तो ‘अल्गोरिदम’ ही परम सत्य है

जनता की मूलभूत समस्याएं जैसे सड़क, बिजली, पानी और रोजगार? अजी छोड़िए! देश के नए नवेले ‘जेन-ज़ी’ और अभी से रील्स स्क्रॉल कर रही ‘जेन-अल्फा’ की फौज को इन बोरिंग मुद्दों से क्या लेना-देना? उन्हें तो ‘एस्थेटिक’ रैलियां चाहिए। चुनावी घोषणापत्र की जगह अब ‘सिग्मा रूल’ वाले 15 सेकंड के शॉर्ट्स चलते हैं। जो भारतीय राजनेता कल तक जातिगत समीकरणों के गणित में पीएचडी थे, आज वे इस बात से डिप्रेशन में हैं कि उनकी नई रील पर ‘रीच’ कम क्यों आई। अब जनता को रिझाने के लिए काम नहीं, बल्कि ‘नो कैप’, ‘वोक’ और ‘स्ले’ जैसी भाषा सीखी जा रही है।

‘काक-वाणी’ का निष्कर्ष: संसद में ‘पीक सिनेमा’ का इंतजार

काक-वाणी का मानना है कि वह दिन दूर नहीं जब देश का बजट भाषण किसी अजीबोगरीब बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ पेश किया जाएगा और गृहमंत्री विपक्ष को ‘ब्रो, यू आर क्रिंज’ कहकर चुप कराएंगे। जब देश की नीति देश के बुज़ुर्ग नहीं, बल्कि युवाओं के रील्स स्क्रॉल करने वाले अंगूठे तय कर रहे हों, तो पारंपरिक राजनीति का पतन तो निश्चित है। नेताजी, अब देश का विकास छोड़िए, बस अपना ‘रिज़’ बचाए रखिए, क्योंकि अगली बार वोट ‘काम’ पर नहीं, केवल ‘कमेंट्स’ और ‘शेयर्स’ पर मिलने वाले हैं!


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कागा जी