अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘फ्रंटलाइन’ ने एक बेहद गंभीर, गहन और आंसू बहाने वाला लेख छापा है—”वामपंथ दक्षिणपंथ से जमीन क्यों हार रहा है, और यह उम्मीद की राजनीति को कैसे वापस पा सकता है।” वाह! क्या शीर्षक है! दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बैठकर, ब्लैक कॉफी की चुस्की लेते हुए वामपंथ के पतन पर मातम मनाना और ‘उम्मीद की राजनीति’ का ज्ञान बांटना, हमारे बौद्धिक कामरेडों का सबसे पसंदीदा राष्ट्रीय खेल रहा है।
क्रांति अब केवल सेमिनारों में उबलती है
‘काक-वाणी’ के पाठक अच्छी तरह जानते हैं कि जब-जब देश का मजदूर और किसान अपनी रोजी-रोटी की तलाश में दक्षिणपंथ के नारों के पीछे चलने लगता है, तब-तब हमारे लिबरल थिंक-टैंकों को ‘वर्ग चेतना’ की याद आती है। समस्या यह है कि राइट-विंग वाले जनता के हाथों में धर्म, राष्ट्रवाद और जनकल्याणकारी योजनाओं का राशन थमा रहे हैं, जबकि हमारे वामपंथी उन्हें ‘दास कैपिटल’ का चौथा अध्याय समझाने की कोशिश में जुटे हैं। अब आप ही बताइए, भूखा पेट कार्ल मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पढ़ेगा या राशन की लाइन में लगेगा?
दक्षिणपंथ ने जनता को एक ‘पहचान’ दी, चाहे वह कैसी भी हो। दूसरी तरफ वामपंथ ने जनता को क्या दिया? केवल ‘फासीवाद’ नापने वाला थर्मामीटर! जो भी कामरेडों के कठिन सिद्धांतों से सहमत न हो, उस पर तुरंत ‘फासीवादी’ या ‘अज्ञानी’ का लेबल चिपका दो और अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता का जश्न मनाओ। चुनाव में भले ही जमानत जब्त हो जाए, लेकिन जेएनयू और जाधवपुर के ढाबों पर क्रांति का झंडा हमेशा बुलंद रहना चाहिए!
‘उम्मीद की राजनीति’ या बौद्धिक अहंकार?
‘फ्रंटलाइन’ का लेख पूछ रहा है कि वामपंथ ‘उम्मीद की राजनीति’ को कैसे वापस लाए? जवाब बहुत सरल है, लेकिन कामरेडों के लिए बहुत कड़वा भी। जब तक आप आम जनता को केवल अपनी किताबों और रिसर्च पेपर्स का विषय बनाएंगे, तब तक वे आपको वोट के काबिल नहीं समझेंगे। आज का वामपंथ जमीन का जन-आंदोलन नहीं, बल्कि केवल अंग्रेजी पत्रिकाओं के संपादकीय पन्नों तक सिमट कर रह गया है।
दक्षिणपंथ ने उम्मीद को ‘भविष्य के भव्य सपने’ में बदल दिया है, जबकि वामपंथ अतीत के सोवियत संघ की यादों से बाहर आने को तैयार ही नहीं है। अगर वामपंथ को सचमुच ‘उम्मीद’ जगानी है, तो उन्हें एसी कमरों और बड़े-बड़े सेमिनारों से बाहर निकलकर ज़मीन की धूल फांकनी होगी। लेकिन अफ़सोस, धूल से कामरेडों के महंगे लिनेन के कुर्ते खराब हो जाते हैं!
अंत में, ‘काक-वाणी’ की सीधी सलाह—जब तक वामपंथियों की क्रांति केवल ‘फ्रंटलाइन’ के लेखों और सोशल मीडिया के हैशटैग्स तक सीमित रहेगी, तब तक दक्षिणपंथ चुनाव दर चुनाव उन्हें हराकर लाल झंडे को केवल संग्रहालय की शोभा बनाए रखेगा। लाल सलाम, लेकिन कृपया ज़रा ज़मीन पर आकर बोलिए!
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