विशाल दंडकारण्य वन में सिंहदत्त नाम का एक प्रतापी शेर राज करता था। उसकी एक दहाड़ से पूरा जंगल कांप उठता था। लेकिन समय का चक्र कभी एक समान नहीं रहता। ढलती उम्र के साथ सिंहदत्त की आंखों की रोशनी धुंधली होने लगी और उसके शरीर की ताकत छिन गई। जो पशु कल तक उसके सामने सिर झुकाते थे, आज वही उसका उपहास उड़ाने लगे। भूखा-प्यासा शेर अपनी गुफा में असहाय पड़ा रहता था।
अहंकार के ढहने पर मिला सच्चा स्नेही
एक दिन जब शेर जीवन की आस छोड़ चुका था, तब उसके पास ‘पिंकी’ नाम की एक नन्हीं गिलहरी आई। वह अपने साथ मीठे फल और जल लाई थी। शेर ने आश्चर्य से पूछा, “हे छोटी जीव! जंगल के बड़े-बड़े गजराज और चीते मुझे अकेला छोड़कर चले गए, फिर तुम मेरी सहायता क्यों कर रही हो?”
गिलहरी की आंखों में कृतज्ञता के आंसू थे। उसने नम्रता से कहा, “महाराज! क्या आपको याद है? वर्षों पहले एक भयंकर तूफान में मेरा घोंसला टूट गया था और मैं नदी की तेज़ धार में बह रही थी। तब आपने अपनी विशाल देह अड़ाकर मुझे डूबने से बचाया था। आज भले ही आपकी शक्ति क्षीण हो गई है, लेकिन मेरे लिए आप आज भी इस जंगल के सबसे महान राजा हैं।” यह सुनकर शेर की आंखों से आंसू छलक पड़े।
संकट की घड़ी और अनूठा समर्पण
समय बीतता गया। नन्हीं गिलहरी रोज़ बूढ़े शेर के लिए भोजन लाती और उसका एकाकीपन दूर करती। एक शाम जंगल में क्रूर शिकारी आ पहुंचे। उन्होंने गुफा के बाहर एक मज़बूत जाल बिछा दिया। कम रोशनी के कारण बूढ़ा शेर उस जाल में बुरी तरह फंस गया। जाल में बंधा शेर बेबस होकर कराहने लगा।
शिकारी जब तक उसे ले जाने के लिए पास आते, पिंकी ने तनिक भी विलंब नहीं किया। वह तुरंत जंगल के चूहों के पास भागी और उनसे रो-रोकर मदद की गुहार लगाई। गिलहरी का निस्वार्थ प्रेम देखकर सैकड़ों चूहे गुफा की ओर दौड़े। शिकारियों के पास पहुंचने से पहले ही चूहों के नुकीले दांतों ने उस मज़बूत जाल को काटकर तार-तार कर दिया। शेर आज़ाद हो गया। शिकारियों ने जब चूहों और गिलहरी का यह अद्भुत समर्पण देखा, तो वे भयभीत होकर भाग खड़े हुए।
सच्चा संबंध आकार का मोहताज नहीं
उस दिन सिंहदत्त ने समझा कि वास्तविक शक्ति केवल शारीरिक बल में नहीं, बल्कि प्रेम, वफादारी और कृतज्ञता में होती है। उस विशालकाय शेर ने नन्हीं गिलहरी के सामने अपना मस्तक झुका दिया। दोनों का यह रिश्ता अंत तक बना रहा।
कहानी की सीख: इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि किसी भी जीव का मूल्य उसके आकार या शक्ति से नहीं, बल्कि उसके हृदय और संस्कारों से तय होता है। बुरे समय में किया गया एक छोटा सा उपकार भी संकट के दिनों में महा-रक्षक बनकर लौटता है।