एक समृद्ध सेठ और उसका खालीपन
बहुत समय पहले की बात है, सोनपुर नाम के एक समृद्ध गाँव में धर्मदत्त नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। उसके पास धन, संपत्ति और मान-सम्मान की कोई कमी नहीं थी। लेकिन जैसे-जैसे उसकी उम्र ढल रही थी, उसे मौत का डर सताने लगा था। वह दिन-रात यही सोचता था कि मरने के बाद उसके इस विशाल साम्राज्य और अथाह सोने-चांदी का क्या होगा? क्या वह अपनी इस मेहनत की कमाई को अपने साथ अगले जन्म में नहीं ले जा सकता?
महात्मा का आगमन और विचित्र चुनौती
एक दिन गाँव में एक सिद्ध महात्मा का आगमन हुआ। धर्मदत्त अपनी चिंता लेकर उनके पास पहुँचा। उसने अपनी झोली खोलकर महात्मा के सामने रख दी और कहा, “हे गुरुदेव! मेरे पास बहुत धन है। मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मैं अपनी इस दौलत का एक छोटा सा हिस्सा भी परलोक ले जा सकूँ।”
महात्मा मुस्कुराए और उन्होंने अपनी झोली से मिट्टी का एक छोटा सा कटोरा निकाला। उन्होंने धर्मदत्त से कहा, “पुत्र, तुम इस छोटे से कटोरे को अपने सोने के सिक्कों से भर दो। यदि तुम इसे पूरा भर सके, तो मैं तुम्हें परलोक में धन ले जाने का गुप्त मार्ग बता दूँगा।”
अंतहीन लालच की परीक्षा
धर्मदत्त बहुत खुश हुआ। उसने तुरंत अपने सेवकों को सोने से भरी तिजोरियाँ लाने का आदेश दिया। उसने मुट्ठी भर-भरकर सोने के सिक्के उस मिट्टी के कटोरे में डालना शुरू किया। लेकिन यह क्या! सिक्का गिरते ही गायब हो जाता और कटोरा वैसा ही खाली का खाली रहता। उसने एक-एक करके अपनी तिजोरियाँ खाली कर दीं, यहाँ तक कि अपनी पूरी संपत्ति दांव पर लगा दी, लेकिन वह छोटा सा मिट्टी का कटोरा कभी नहीं भरा।
थक-हारकर धर्मदत्त महात्मा के चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला, “महाराज, मैं हार गया। इस चमत्कारी कटोरे का रहस्य क्या है? यह असीमित सोने से भी क्यों नहीं भरा?”
जीवन का परम सत्य
महात्मा ने अत्यंत करुणा से धर्मदत्त के सिर पर हाथ रखा और कहा, “धर्मदत्त, यह कोई साधारण मिट्टी का कटोरा नहीं है। यह इंसान की इच्छाओं और लालच से बनी इंसानी खोपड़ी का प्रतीक है। मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है। वह जीवनभर सांसारिक वस्तुएं, धन और संपत्ति इस घड़े में डालता रहता है, लेकिन मौत के समय यह खाली की खाली ही रह जाती है।”
महात्मा की बात सुनकर धर्मदत्त की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे समझ आ गया कि वह जीवनभर जिस माया के पीछे भाग रहा था, वह अंत में उसके साथ नहीं जाने वाली। उसने पूछा, “तो फिर मेरे साथ क्या जाएगा, गुरुदेव?”
महात्मा ने शांत स्वर में कहा, “केवल तुम्हारे अच्छे कर्म, दूसरों की मदद, और निस्वार्थ प्रेम ही वह अनमोल धन हैं जो परलोक में तुम्हारे साथ जाएंगे। यही जीवन का अंतिम सच है।”
सीख
सीख: जीवन का असली सच यही है कि हम इस संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाना है। भौतिक संपत्ति यहीं छूट जाती है, केवल हमारे द्वारा किए गए सत्कर्म और दूसरों के प्रति हमारा प्रेम ही हमारी आत्मा के सच्चे साथी होते हैं।