‘सस्ते तेल’ की खुशबू और ‘सौ फीसदी’ टैक्स का तड़का: सुपरपावर की नई ‘झप्पी’ कूटनीति!

वाह! अमेरिका और भारत की ‘गहरी दोस्ती’ का एक और सुनहरा अध्याय लिखा जा रहा है। वही दोस्ती, जिसमें हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपतियों के बीच की ‘झप्पियां’ दुनिया भर के कैमरों की हेडलाइन बनती हैं। लेकिन इस बार, व्हाइट हाउस के ड्राइंग रूम से नहीं, बल्कि अमेरिकी संसद (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) के गलियारों से एक बेहद ‘प्यारा’ तोहफा आया है। खबर आई है कि अगर भारत ने रूस से ‘सस्ता’ तेल खरीदना बंद नहीं किया, तो अमेरिका दादाजी की तरह आंखें तरेरते हुए भारत पर 100% टैरिफ (सीमा शुल्क) ठोक देगा। इसे कहते हैं—’तुम जियो हजारों साल, पर तेल हमारी मर्जी का पियो!’

दोस्ती में ‘सौ टका’ टैक्स का तड़का

गजब की कूटनीति है! एक तरफ अमेरिकी सीनेटर भारत को चीन के खिलाफ ‘परम मित्र’ और ‘एशियाई ढाल’ बताते हैं, और दूसरी तरफ रूस से आ रहे सस्ते तेल की बूंद-बूंद का हिसाब मांगते हैं। नरेंद्र मोदी सरकार ने बड़े चाव से रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदा, उसे रिफाइन किया और देश की जनता को महंगाई से बचाने का दावा किया। लेकिन अब अमेरिकी संसद ने कह दिया है कि अगर रूस से दोस्ती रखनी है, तो वाशिंगटन को 100% टैक्स का ‘प्रसाद’ चढ़ाना होगा। लगता है सुपरपावर को हमारी ‘सस्ते में निपटने’ की देसी आदत बिल्कुल रास नहीं आ रही है।

‘जयशंकर कूटनीति’ बनाम वाशिंगटन का डंडा

अब देखना यह होगा कि हमारे विदेश मंत्रालय के तीखे तरकश से कौन सा नया बाण निकलता है। क्या इस बार भी पश्चिमी देशों को उनकी ही भाषा में करारा जवाब मिलेगा, या फिर हमें चुपचाप अपनी गाड़ियों में महंगे तेल का ‘राष्ट्रवादी’ पेट्रोल डलवाना पड़ेगा? आखिर नरेंद्र मोदी के ‘विश्वगुरु’ वाले भारत को यह धमकी देने की हिम्मत अमेरिका में कैसे हुई? जो बाइडन प्रशासन शायद भूल गया है कि हम भारतीयों को ‘बाय वन गेट वन फ्री’ की आदत है, ‘बाय वन पे डबल’ की नहीं।

लोकतंत्र का ‘डबल स्टैंडर्ड’

सच्चाई तो यह है कि जब खुद पश्चिमी देश रूस से गुपचुप तरीके से यूरेनियम और गैस खरीदते हैं, तो वह ‘रणनीतिक मजबूरी’ कहलाती है। लेकिन जब भारत अपने 140 करोड़ नागरिकों के हित में सस्ता तेल लाता है, तो वह ‘ग्लोबल नियम’ तोड़ना बन जाता है। इस नए विधेयक से साफ है कि अमेरिका की दोस्ती ‘फायदे का सौदा’ है—फायदा उनका, और सौदा हमारा। काक-वाणी का तो यही मानना है कि अगली बार अमेरिकी राष्ट्रपति को गले लगाने से पहले, हमारे नेताओं को अपनी जेब और अपनी संप्रभुता दोनों को जरा मजबूती से पकड़ कर रखना होगा।


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कागा जी