वाह री कूटनीति! बांग्लादेश में सत्ता के रंगमंच पर अभी नए किरदारों की एंट्री ठीक से हो भी नहीं पाई थी कि बीएनपी के ‘लंदन-रिटर्न’ भाग्यविधाता तारिक रहमान साहब ने दिल्ली आने के लिए अपने सूटकेस में ढाकाई मलमल और शाही इत्र सजना शुरू कर दिया था। लेकिन हाय रे कूटनीतिक किस्मत! खबर आई कि दौरा टल गया। अब इस ‘टलने’ के पीछे का असली कारण वीजा की कंगाली है या दिल्ली दरबार का ‘ठंडा रिस्पॉन्स’, यह तो वक्त ही बताएगा। पर इस एक घटना से ‘अल जज़ीरा’ के दफ्तर में ऐसा मातम छाया है, मानो दक्षिण एशिया की पूरी भू-राजनीति का अंत हो गया हो।
सूटकेस पैक था, पर दिल्ली अभी बहुत दूर है!
काक-वाणी के गुप्त सूत्रों (जो अक्सर चाय की टपरी पर कूटनीति सुलझाते हैं) के अनुसार, तारिक रहमान साहब को लगा था कि जैसे ही वे भारत की धरती पर कदम रखेंगे, लाल कालीन बिछ जाएगा। आखिरकार, पड़ोसी के नए ‘दामाद’ का स्वागत तो बनता ही है! लेकिन दिल्ली ने बड़ी ही शालीनता से उन्हें याद दिला दिया कि राजनीति में ‘वेटिंग लिस्ट’ वाले टिकट इतनी जल्दी कन्फर्म नहीं होते। शेख हसीना के विदा होने के बाद, दिल्ली अभी ‘पहले तुम संभल जाओ, फिर हम चाय पर चर्चा करेंगे’ वाले मोड में है। रहमान साहब को समझ आ गया होगा कि दिल्ली का दिल जीतना ढाका की रैलियों में भाषण देने जितना आसान नहीं है।
अल जज़ीरा का ‘वैश्विक रोना’ और भारतीय चाय
अब बात करते हैं हमारे प्यारे ‘अल जज़ीरा’ की, जिसका काम ही तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाना है। रहमान साहब का पैर क्या थमा, अल जज़ीरा ने इसे भारत-बांग्लादेश संबंधों का ‘ऐतिहासिक गतिरोध’ घोषित कर दिया। उनके लंबे-चौड़े विश्लेषण को देखकर लग रहा था मानो इस एक दौरे के टलने से गंगा-ब्रह्मपुत्र का पानी उलटा बहने लगेगा। अरे भाई, कभी-कभी दौरा टलना सिर्फ एक प्रशासनिक देरी होती है, उसे ‘चीन बनाम भारत’ का महायुद्ध मत घोषित कीजिए।
रिश्तों की नई ‘खींचतान’
सच तो यह है कि बीएनपी का पुराना भारत-विरोधी इतिहास और अचानक जागा यह नया प्रेम-राग, दिल्ली के कूटनीतिज्ञों को पचाने में थोड़ा वक्त लगेगा। जब तक पुराना हिसाब-किताब बराबर नहीं होता, तब तक रहमान साहब को लंदन की ठंड में ही अपनी कूटनीतिक रोटियां सेंकनी होंगी। काक-वाणी की मुफ्त सलाह है—अगली बार सूटकेस तभी पैक करें, जब दिल्ली से ‘कन्फर्म’ का संदेशा व्हाट्सएप पर आ जाए!
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