100 दिन और बदल गया देश का ‘मैट्रिक्स’: क्रांतिकारी चश्मे का नया कमाल

अहा! क्या जादुई सुर्खी है। “सौ दिन जिन्होंने भारत के राजनीतिक मैट्रिक्स को बदल दिया।” इसे पढ़कर दिल को जो सुकून मिला, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। ऐसा लगा मानो न्यूटन के नियमों को धता बताते हुए देश के सारे राजनेता अचानक अल्बर्ट आइंस्टीन बन गए हैं। ‘काक-वाणी’ के इस विशेष स्तंभ में हम इस चमत्कारी बदलाव की गहराई में गोता लगाएंगे, क्योंकि जब ‘मैट्रिक्स’ बदलता है, तो आम जनता को भी पता चलना चाहिए कि उनकी जेब क्यों उतनी ही खाली है, भले ही देश का पॉलिटिकल थियेटर कितना ही हाई-टेक क्यों न हो गया हो!

सौ दिनों का महा-चमत्कार और हमारा ‘न्यू इंडिया’

इन सौ दिनों में सरकार ने ऐसा अभिनय किया है मानो उन्होंने इतिहास, भूगोल और नागरिक शास्त्र सब एक साथ बदल दिया हो। पहले सौ दिनों में इतने वादे, इतनी घोषणाएं और इतनी पीठ थपथपाहट हुई कि जनता यह सोचने पर मजबूर हो गई कि पिछले दस सालों में क्या सिर्फ ‘वार्म-अप’ चल रहा था? असली खेल तो अब शुरू हुआ है! इस नए मैट्रिक्स की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें नीतिगत ‘यू-टर्न’ को “लचीलापन” कहा जाता है और बजट के झटकों को “आर्थिक सुधार”। वाह! इसे कहते हैं मैट्रिक्स का असली रीडिजाइन, जहां गड्ढे वाली सड़कें भी आपको डिजिटल हाईवे का अहसास कराने लगती हैं।

द वायर का दूरबीन और विपक्ष का ‘रीलोडेड’ वर्जन

दूसरी तरफ, हमारे अति-बौद्धिक विश्लेषक और ‘द वायर’ जैसे क्रांतिकारी मंच इस सौ दिनों में लोकतंत्र की पुनरावृत्ति देख रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि संसद में विपक्ष के आते ही सीधे ‘मैट्रिक्स’ फिल्म की तरह गोलियां हवा में रुक गई हैं। अब तो आलम यह है कि विपक्ष के नेता जब हल्के से खांसते भी हैं, तो विश्लेषक उसमें “फासीवाद के खिलाफ एक सुरीली गूंज” ढूंढ लेते हैं। सौ दिनों में ऐसा नैरेटिव सेट किया गया है मानो पहले देश में सिर्फ तानाशाही की धूप थी, और अब अचानक संविधान की ठंडी हवाएं चलने लगी हैं। पर जनाब, इस मैट्रिक्स में जनता आज भी उसी कतार में खड़ी है, जहां वह सौ दिन पहले थी।

काक-वाणी का कड़वा सच: मैट्रिक्स बदला या सिर्फ चश्मा?

सच तो यह है कि न मैट्रिक्स बदला है और न ही देश का भाग्य। बदला है तो सिर्फ नेताओं का अहंकार और विश्लेषकों का कीबोर्ड। सरकार अब भी सोचती है कि वह अजेय है (भले ही बैसाखियों के सहारे हो), विपक्ष सोचता है कि उसने किला फतह कर लिया है, और हमारे पत्रकार मित्रों को लगता है कि क्रांति बस अगले सौ मीटर की दूरी पर चाय की दुकान पर खड़ी है। इस पूरी लड़ाई में आम आदमी बेचारा ‘रेड पिल’ और ‘ब्लू पिल’ के चक्कर में पिसा जा रहा है। काक-वाणी तो यही कहेगी—मैट्रिक्स चाहे जो बदले, जब तक सड़कों के गड्ढे, महंगाई और बेरोजगारी का पुराना ‘कोड’ नहीं बदलता, तब तक यह सब केवल बौद्धिकों की ड्रामेबाजी है!


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कागा जी