ईरान का ‘भारत-प्रेम’: जब-जब दुनिया आंखें दिखाए, हमें चाबहार याद आए!

काक-वाणी के पाठकों, वैश्विक कूटनीति के रंगमंच पर एक बार फिर ‘फेसबुक फ्रेंडशिप’ जैसी भावनाएं उमड़ रही हैं। ईरान के नए राष्ट्रपति साहब को अचानक भारत से अपने सदियों पुराने, ऐतिहासिक और ‘अटूट’ संबंधों की याद आ गई है। वैसे तो कूटनीति में एक पुराना नियम है कि ‘कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता’, लेकिन ईरान के मामले में एक नया नियम लागू होता है—’जब-जब पश्चिम से प्रतिबंधों की मार पड़े, तब-तब भारत की याद आए।’

चाबहार बंदरगाह और तेल की ‘चाय’: रिश्तों की नई मिठास

ईरानी राष्ट्रपति का यह ताजा बयान कि वे भारत के साथ रिश्तों को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं, सुनकर हमारे कूटनीतिक गलियारों में भावुकता का सैलाब आ गया है। इतनी मोहब्बत! वह भी तब, जब मध्य-पूर्व में बारूद की गंध फैली हो। आखिर इस प्रेम की गहराई चाबहार बंदरगाह के रास्ते से होकर गुजरती है। ईरान को लगता है कि भारत वह सीधा-साधा ग्लोबल बच्चा है, जो क्लास के सबसे रसूखदार लड़के (अमेरिका) से भी हाथ मिलाएगा और बैकबेंच पर बैठे बागी (ईरान) के साथ भी अपना टिफिन शेयर करेगा।

बैलेंसिंग एक्ट: न अमेरिका रूठे, न ईरान छूटे

भारतीय विदेश मंत्रालय के लिए ईरान का यह प्यार उस दोराहे जैसा है, जहां एक तरफ कुआं है और दूसरी तरफ गहरी खाई। हमें दामाद (अमेरिका) को भी खुश रखना है और पुराने दोस्त (ईरान) का भी मान रखना है। राष्ट्रपति साहब कह रहे हैं कि दोनों देशों के बीच सहयोग की असीम संभावनाएं हैं। बिल्कुल हैं! हम उनसे कच्चा तेल खरीदना चाहते हैं, बशर्ते वाशिंगटन के दादाजी नाराज न हों। और ईरान हमसे बासमती चावल और चाय चाहता है, ताकि प्रतिबंधों के सूखे में कम से कम कूटनीतिक बिरयानी का स्वाद तो बना रहे।

काक-वाणी का कड़वा सच

तो लब्बोलुआब यह है कि ईरान का यह ‘संकल्प’ कूटनीतिक मजबूरी की चाशनी में डूबी हुई वह जलेबी है, जिसे सीधे निगलना मुश्किल है। जब दुनिया में हर तरफ से रास्ते बंद होने लगते हैं, तो भारत की ‘वसुधैव कुटुंबकम’ वाली खिड़की हमेशा खुली दिखाई देती है। ईरान के राष्ट्रपति जी, आपका यह संकल्प सराहनीय है, लेकिन जरा संभलकर! कहीं ऐसा न हो कि रिश्तों को ‘विस्तार’ देते-देते बीच में डॉलर का ‘पेमेंट गेटवे’ अटक जाए। खैर, जब तक बातचीत चल रही है, तब तक पिस्ता और खजूर का लेन-देन जारी रहना चाहिए। आखिर कूटनीति भी तो खाली पेट नहीं हो सकती!


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कागा जी