अहा! इतिहास की धूल छानकर जब ‘द वायर’ जैसा क्रांतिकारी पोर्टल कोई नया हीरा निकालता है, तो दिल सचमुच बाग-बाग हो जाता है। हाल ही में उन्होंने दुनिया को याद दिलाया कि कैसे भारतीय कम्युनिस्टों ने एक ऐसा विशाल ‘जन आंदोलन’ खड़ा किया था कि बेचारा ‘राज्य’ (यानी सरकार) डर के मारे थर-थर कांपने लगा था। अब इस ऐतिहासिक सत्य को सुनकर आज के मतदाता भले ही अपनी हंसी न रोक पा रहे हों, लेकिन यह सच है कि लाल रंग को देखकर कभी-कभी सत्ता के गलियारों में कंपकंपी छूट जाती थी।
क्रांति का नया पता: जेएनयू का ढाबा और सोशल मीडिया
आजकल के नासमझ लोग पूछते हैं कि भाई, ये कम्युनिस्टों का ‘मास मूवमेंट’ आजकल दिखाई क्यों नहीं देता? अब इन अज्ञानियों को कौन समझाए कि क्रांति हमेशा सड़क पर धूप में काली पीली होकर की जाए, यह जरूरी नहीं है। आज का सबसे बड़ा सर्वहारा आंदोलन जेएनयू के ढाबों और इंडिया हैबिटेट सेंटर के वातानुकूलित कमरों में, महंगी कॉफी पर ‘पूंजीवाद के विनाश’ की चर्चा करते हुए लड़ा जाता है। ट्विटर (X) पर ‘फासीवाद’ के खिलाफ हैशटैग चलाना ही तो असली जन संघर्ष है। राज्य का भय इतना गहरा है कि चुनाव दर चुनाव कम्युनिस्टों की सीटें शून्य की तरफ बढ़ रही हैं, ताकि राज्य को कानों-कान भनक न लगे कि वे कब चुपके से क्रांति कर देंगे। इसे कहते हैं ‘रणनीतिक रूप से गायब होना’!
राज्य का ‘भय’ और लाल सलाम का रोमांच
द वायर के अनुसार राज्य इनसे डरता था। बिल्कुल सही बात है! राज्य आज भी इस बात से बेहद डरा रहता है कि कहीं ये वामपंथी बुद्धिजीवी अपनी कड़क चाय और भारी-भरकम रूसी शब्दावलियों से देश की आम जनता को पूरी तरह भ्रमित न कर दें। जब कॉमरेड ‘पूंजीवादी शोषकों’ के खिलाफ अपनी भौहें तानते हैं, तो कॉरपोरेट जगत डर के मारे अपनी तिजोरियां छुपाने की बजाय अपनी हंसी छुपाने का प्रयास करने लगता है। केरल को छोड़कर पूरे देश में जो ‘शून्य’ का सन्नाटा पसरा है, वह असल में राज्य को डराने के लिए वामपंथियों की एक गहरी और सोची-समझी मौन साधना है।
अंततः, इस महान और अदृश्य ‘जन आंदोलन’ के इतिहास को जीवित रखने के लिए हमें ‘द वायर’ का सदैव आभारी होना चाहिए। जब तक ऐसे पोर्टल जीवित हैं, तब तक कम्युनिस्ट क्रांति इंटरनेट के पन्नों पर अंगारे उगलती रहेगी, भले ही जमीन पर कॉमरेडों को खोजने के लिए प्रशासन को सर्च वारंट जारी करना पड़े। लाल सलाम, जो अब केवल ‘स्मृतियों’ के लाल बक्से में सुरक्षित है!
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