दो भाइयों की जुदाई और संगति का सच: पंचतंत्र की एक भावुक कहानी

तूफान और जुदाई की वो काली रात

विशाल नीलगिरि पर्वत के घने जंगलों में एक बरगद के पेड़ पर दो सुंदर तोते रहते थे – रामू और श्यामू। वे दोनों सगे भाई थे और एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे। उनकी मां हमेशा उन्हें मीठी बोली बोलना और दूसरों का आदर करना सिखाती थी। चारों तरफ शांति और खुशहाली थी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक शाम, जंगल में एक भयानक तूफान आया। कड़कती बिजली और तेज हवाओं ने उस बरगद के पेड़ को झकझोर कर रख दिया। मां ने अपने बच्चों को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन तेज हवा के झोंके में दोनों भाई अपनी मां से बिछड़ गए और दो अलग-अलग दिशाओं में बह गए। वह रात उनके जीवन की सबसे दर्दनाक रात थी।

दो अलग रास्ते, दो अलग जिंदगियां

जब तूफान थमा, तो दोनों भाइयों की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी। रामू उड़ते-उड़ते डाकुओं की एक बस्ती के पास गिरा। वहां रहने वाले एक क्रूर डाकू कालिया ने उसे उठा लिया और एक पिंजरे में बंद कर दिया। दूसरी तरफ, श्यामू बहते-बहते एक शांत और पवित्र आश्रम में जा गिरा, जहां एक परम ज्ञानी और दयालु साधु रहते थे। साधु ने श्यामू को बड़े प्यार से अपने पास रख लिया। इस तरह, एक ही मां की कोख से जन्मे दो मासूम बच्चे दो पूरी तरह से विपरीत माहौल में बड़े होने लगे।

समय बीतता गया। रामू ने डाकुओं के बीच रहकर केवल गाली-गलौज, लूटपाट, चीख-पुकार और नफरत की बातें सुनीं। धीरे-धीरे वह भी वही सब सीख गया। जब भी कोई अजनबी वहां से गुजरता, वह गुस्से में चिल्लाता, “पकड़ो! मारो! लूट लो इसे! जाने मत देना!”

वहीं दूसरी ओर, श्यामू ने आश्रम में रहकर सुबह-शाम वेद-मंत्रों का उच्चारण, अतिथियों का सत्कार और प्रेम की भाषा सीखी। वह हर आने-जाने वाले का स्वागत बड़े ही आदर के साथ करता था, “आइए महोदय, आपका स्वागत है। जल ग्रहण कीजिए और विश्राम कीजिए।”

राजा की परीक्षा और सत्य का सामना

एक दिन, उस राज्य के राजा शिकार खेलते हुए डाकुओं के इलाके से गुजरे। राजा को थका हुआ देखकर पेड़ पर बैठा रामू जोर-जोर से चिल्लाने लगा, “पकड़ो! इसके पास बहुत सोने के आभूषण हैं! इसे लूट लो! मार डालो इसे!” रामू की आवाज में इतनी कड़वाहट और नफरत थी कि राजा डर गए और तुरंत वहां से अपने घोड़े पर सवार होकर भाग निकले।

भागते-भागते राजा थककर चूर हो चुके थे और अंत में साधु के आश्रम के पास पहुंचे। वहां पेड़ पर बैठा श्यामू राजा को देखकर बहुत ही मधुर और शांत आवाज में बोला, “प्रणाम राजन! आप बहुत थके हुए लग रहे हैं। कृपया आश्रम के भीतर पधारें, शीतल जल पिएं और कुछ समय विश्राम करें।”

राजा हैरान रह गए। दोनों तोते रूप-रंग में बिल्कुल एक जैसे थे, पर उनकी बोली और व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर था। तभी आश्रम के साधु बाहर आए। राजा ने हाथ जोड़कर अपनी उलझन साधु के सामने रखी। साधु मुस्कुराए और बोले, “राजन! ये दोनों सगे भाई हैं, जो बचपन के एक तूफान में बिछड़ गए थे। इनमें कोई बुराई नहीं है, यह केवल संगति का असर है। जो जैसा सुनता और देखता है, वह वैसा ही बन जाता है।”

यह सुनकर राजा की आंखें भर आईं। उन्हें समझ आ गया कि सही वातावरण और अच्छे संस्कार ही इंसान के चरित्र का निर्माण करते हैं।

कहानी से सीख

इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि इंसान का जन्म चाहे जहां भी हुआ हो, लेकिन उसकी संगति ही उसका भविष्य तय करती है। बुरी संगति अच्छे से अच्छे इंसान को भी राह से भटका देती है, जबकि अच्छी संगति अज्ञानी को भी पूजनीय बना देती है। इसलिए सदैव अच्छे विचारों और सकारात्मक लोगों के साथ रहें।

कागा जी