ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार ‘द गार्जियन’ ने हाल ही में एक अजीबोगरीब खबर छापी है। वे दावा कर रहे हैं कि भारत की महिलाएं बदलाव के लिए ‘अधीर’ (इम्पेशेंट) हो रही हैं और सड़कों पर उतर रही हैं। अब भला बताइए, हमारे देश की संस्कारी महिलाओं को यह विदेशी बीमारी किसने लगा दी? हमारे यहां तो ‘सब्र का फल मीठा होता है’ की घुट्टी पीकर पीढ़ियां गुजर जाती हैं, और इन आधुनिक महिलाओं को दो-चार दशकों में ही न्याय, सुरक्षा और समानता की जल्दी मची है! वास्तव में, यह हमारी महान संस्कृति और सत्तारूढ़ भाजपा के ‘धैर्य-प्रधान’ विकास मॉडल पर एक सीधा और क्रूर हमला है।
वैसे भी, पश्चिम के गोरे पत्रकारों को हमारी ‘प्रतीक्षा करने की महान राष्ट्रीय कला’ समझ नहीं आती। हमारे देश में पुरुष न्याय के लिए अदालतों में अपनी तीन पीढ़ियां हंसते-हंसते बिता देते हैं, फिर ये महिलाएं चंद सालों में ही अपनी सुरक्षा और गरिमा की मांग को लेकर इतनी उतावली क्यों हो रही हैं? क्या इन्हें हमारे सिस्टम की कछुआ गति पर भरोसा नहीं है?
चुनावी वादों की ‘अमृत’ बूंदें और महिलाओं का सूखा
हमारे नीति-निर्माता दिन-रात महिलाओं के लिए ‘अमृत काल’ का स्वर्णिम रोडमैप तैयार कर रहे हैं। लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है—साल 2047 तक सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन इन ‘अधीर’ आंदोलनकारियों को आज ही सुरक्षित सड़कें, आज ही पुलिस की तत्परता और आज ही अपराधियों को सजा चाहिए। आखिर इतनी जल्दबाजी क्यों? क्या वे हमारे संस्कारी नेताओं के इस आश्वासन पर भरोसा नहीं कर सकतीं कि अगले चुनाव के घोषणापत्र में उनकी सुरक्षा का फॉन्ट साइज और बड़ा कर दिया जाएगा? सत्तारूढ़ भाजपा के नेता तो हर रैली में ‘नारी शक्ति’ का ऐसा प्रचंड उद्घोष करते हैं कि यमराज भी थर-थर कांप जाएं, फिर दिल्ली और कोलकाता की सड़कों पर उतरकर तख्तियां दिखाने की क्या तुक है?
‘लाडली’ योजनाओं का अमृत रस और असली कड़वाहट
जब सरकार ने महिलाओं को ‘लाडली बहना’ और ‘महतारी वंदन’ जैसी योजनाओं के जरिए हर महीने हजार-पंद्रह सौ रुपये देकर शांत रहने का अचूक और वैज्ञानिक नुस्खा खोज लिया है, तो फिर ये महिलाएं व्यवस्था बदलने की जिद पर क्यों अड़ी हैं? क्या उन्हें नहीं पता कि देश में बुलेट ट्रेन आ रही है और एक्सप्रेस-वे चमचमा रहे हैं? अब अगर वे घर से बाहर निकलते हुए सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही हैं, तो यह उनकी अपनी ‘मैनेजमेंट स्किल’ की कमी है, सरकार की नीयत की नहीं। जब तक हमारे नेता टीवी चैनलों पर महिला सुरक्षा पर लंबे और भावुक भाषण दे रहे हैं, तब तक किसी भी महिला को अधीर होने का कोई नैतिक और लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है।
काक-वाणी की अंतिम सलाह
अंत में, ‘काक-वाणी’ इन आंदोलनकारी महिलाओं को मुफ्त की सलाह देती है कि वे विदेशी मीडिया की इस ‘अधीरता’ वाली हवा से दूर रहें। अगली बार जब गुस्सा आए, तो धरने पर बैठने और पुलिस की लाठियां खाने के बजाय टीवी खोलें और ‘नारी सशक्तिकरण’ का कोई भव्य सरकारी विज्ञापन देख लें। विश्वास रखिए, जब विज्ञापन में देश इतनी तेजी से बदल रहा है, तो उसे हकीकत में बदलने की क्या जरूरत है? आखिर असली सुख तो ‘अमूर्त’ वादों में ही है, मूर्त हकीकत तो वैसे भी डरावनी होती है!
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