Title: बचपन की दोस्ती
गुप्ता जी के पास उनकी बचपन की फोटो अल्बम हमेशा रखा होता था। उनको देख कर वो हमेशा खुश हो जाते थे क्यूँकि उनके सारे दोस्त, पड़ोसी और खिलौने उसमे थे। जैसे ही वो फोटो अल्बम खोलते, उनके आँखों में कुछ अलग नज़र आती थी और उनकी आँखों में उस समय उन दिनों की याद ताज़ा हो जाती थी जब वो जमीन पर बैठ कर अपनी दोस्तों के साथ खेलते थे।
गुप्ता जी को लगता था कि उस समय के दोस्त वो आज भी जैसे हों, कुछ बढ़े होते हुए भी। वो सोचते थे कि उनकी दोस्ती की सीढ़ियों से ऊपर बढ़ते भी तो उन्हें हमेशा उस बचपने की दिनों के ताजगी से जोड़ते ही रहते होंगे।
एक दिन गुप्ता जी के दोस्त नेहा उनके घर आई। नेहा उनकी बचपन की दोस्त थी जो अपने शहर से दो दिन के लिए आ गई थी। उन्होंने गुप्ता जी को बताया कि वो यहाँ नानी के घर पर रहेंगी। लेकिन उनकी याद आते ही दोनों दोस्त अलग नहीं थीं और दोस्ती के नाम पर दोनों करीब आठ घंटे साथ बैठे रहे।
उन्होंने खेल खूब खेला और फिर साथ खाना खाया, पटाखे जलाए और फूल बिखेरे। आखिर रात हो गयी और नेहा अपने नानी के घर वापस गुप्ता जी की यादों में चली गयी। गुप्ता जी खुश थे क्यूँकि उन्होंने दोस्ती की सच्चाई को देख लिया था। वो समझ गये थे कि उनकी दोस्ती बचपन से आगे नहीं बढ़ पाई थी। वो सोचते थे कि इस ही लिए तो सच्ची दोस्ती दोस्ती कहलाती है।
अगले दिन गुप्ता जी के पास उनके मंडप का सजा हुआ हाथ आ गया। नेहा ने गुप्ता जी को भेजा था। उसके साथ एक कड़क सी मिठाई थी और एक लंबा सा लेटर था। गुप्ता जी ने लेटर का शुरूआत से ही रोने लगे। वो रोते-रोते दोस्ती की एक चित्तोड कहानी सुनते रहे।
नेहा ने उस लेटर में लिखा था कि वो हमेशा उस दिनों को याद करती है जब वो गुप्ता जी के घर आती थी और वो दोनों सबसे पहले अपनी दोस्ती के नाम से कड़क सी मिठाई देखते। वो याद करते हुए लिखी थी कि उन्होंने दोस्ती की पहले मांग की थी लेकिन कभी सोचा ही नहीं था कि दोस्ती इतनी अमर भी हो सकती है। वो लिखी थी कि उनकी दोस्ती अब भी बचपन से ज्यादा ऊंची नहीं हुई होगी क्यूँकि उसमे दोस्ती की सच्चाई, मस्ती की सिद्धि और परिवार की उम्मीद हमेशा होती हैं।
गुप्ता जी बेचैन हो गये थे। वो समझते हुए भी नहीं थे कि उनकी दोस्ती के नाम पर कितने तमसे चलते हैं। उनके मन में सिर्फ उन दोस्तों का खयाल आ रहा था जिनसे वो कभी मिल नहीं पाये।
गुप्ता जी ने अभी उस लेटर को हाथ से नहीं गिरने दिया था कि उनके घर से एक उठा कुत्ता अंधेरी छत की ओर बढ़ता हुआ आया और फिर उससे एक आवाज आयी। वो अंधेरे में हमेशा कमजोर और घबराता हुआ लगता था। गुप्ता जी ने उसे देख कर उस समय फिर से याद किया उस दिन को जब वो अपनी दोस्ती और सामाजिक जिम्मेवारियों से ऊपर उड़ते हुए समय बिता करते थे।
गुप्ता जी ने उस लेटर को पढ़ना शुरू किया। उनकी आँखों में बेचैनी थी क्यूँकि उन्होंने सच्चाई देख ली थी। पता नहीं कहां से एक नया जगत उनकी आँखों के सामने आ गया जो कहता था कि दोस्ती अपने मौलिक संरचना में ही सबसे खुशनुमा और ताकतवर रिश्ता होता है। उनकी आँखों में कुछ समझ आ गया और उन्होंने उस समय समझा कि उन्हें फिर से अपनी दोस्तों के साथ खेलना होगा।
उधर, नेहा के पास भी गुप्ता जी के लेटर का जवाब आ चुका था। नेहा ने लिखा था कि उन्हें अब समझ मे आया था कि कैसे सच्ची दोस्ती की परिभाषा मानो वेबस्टर की डिक्शनरी में कही हुई छोटी सी लाइन से अधिक होती है। उन्होंने लिखा था कि उन्हें याद आया था कि वो धरती पर सबसे ज्यादा बदले में धनवान बनने की कोशिश नहीं कर रही होती, बल्कि सबसे ज्यादा दोस्त बनना चाहती होती।
गुप्ता जी को ये मालूम नहीं था कि नेहा ने भी जब लेटर को पढ़ा था तो अपनी बचपन की दोस्ती याद की थी। उनकी आँखों में थोड़ी सी नमी आ गयी क्यूँकि बचपन खोते हुए कुछ अगर हमेशा हमारी यादों तक बँधा रहता है तो समझना चाहिए कि वो दोस्ती किसी ताकत से अमर है।
इसी दोस्ती के नाम पर गुप्ता जी और नेहा ने फिर से एक साथ बैठ कर खेलते हुए अपनी जिंदगी के नए एक्सपीरियंस बनाए। दोस्ती जो होती थी ना, कुछ अब महसूस भी नहीं होती थी। वो बस था। जब दोस्ती की एक बार की अमरता को समझ लिया जाता था तो समझा जा सकता है कि वो दोस्ती ही एक संयम का प्रतीक है।