भारतीय शिक्षा प्रणाली में सुधार की बातें तो हम बरसों से सुन रहे हैं। कभी डिजिटल ब्लैकबोर्ड की बात होती है, तो कभी मुफ्त मिड-डे मील की। लेकिन हाल ही में विदेशी मीडिया ‘डीडब्ल्यू’ की एक खबर ने हमारी आंखें खोल दी हैं। खबर है कि भारत के सरकारी स्कूलों में ‘कॉकरोच आंदोलन’ चल रहा है। काक-वाणी के दफ्तर में जब यह खबर आई, तो हमारे मुख्य कौए ने खुशी में दो बार अतिरिक्त ‘कांव-कांव’ की। आखिरकार, हमारे सरकारी स्कूलों को उनकी असलियत के हिसाब से वैश्विक पहचान मिल ही गई!
परमाणु युद्ध झेलने वाले स्कूलों की नई पहचान
वैज्ञानिक कहते हैं कि कॉकरोच एक ऐसा जीव है जो परमाणु हमले को भी झेल सकता है। हमारे शिक्षा मंत्रालय ने शायद इसी वैज्ञानिक तथ्य को गंभीरता से ले लिया है। हमारे सरकारी स्कूलों की इमारतें, जहां छत से पानी टपकता है, शौचालय में दरवाजे नहीं होते और पीने के पानी के नाम पर केवल पाइप का जंग लगा हुआ मुंह होता है—वहां किसी सामान्य इंसान के बच्चे का टिकना नामुमकिन है। ऐसे में, इस कठिन परिस्थिति में केवल कॉकरोच ही वहां जिंदा रह सकते हैं। यह सरकार की दूरगामी सोच का नतीजा है कि उन्होंने स्कूलों को ‘कॉकरोच-फ्रेंडली’ बना दिया है ताकि देश में कोई भी जगह खाली न रहे।
मिड-डे मील में ‘प्रोटीन’ का नया स्रोत
विपक्ष हमेशा रोता रहता है कि बच्चों को मिड-डे मील की थाली में छिपकली और कीड़े मिल रहे हैं। अरे मूर्खों! इसे समस्या नहीं, बल्कि सरकार की एक अनूठी योजना की तरह देखो। शिक्षा मंत्रालय के इस ‘कॉकरोच आंदोलन’ के तहत, बच्चों को बिना किसी अतिरिक्त बजट के मुफ्त में हाई-प्रोटीन डाइट दी जा रही है। जब दुनिया के कुछ देशों में कॉकरोच खाए जा सकते हैं, तो हमारे देश के आत्मनिर्भर बच्चे क्यों पीछे रहें? अब स्कूलों में केवल किताबों का बोझ नहीं, बल्कि जीव विज्ञान का लाइव प्रैक्टिकल सीधे थाली में परोसा जा रहा है।
विश्वगुरु बनने का सबसे सस्ता रास्ता
सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है, लेकिन कॉकरोचों की कोई कमी नहीं है। जब तक मास्टर साहब चुनाव ड्यूटी या जनगणना में व्यस्त रहते हैं, तब तक ये कॉकरोच ही क्लासरूम में बच्चों का मनोरंजन करते हैं और उन्हें जीवन में ‘बिना सुविधाओं के कैसे जीवित रहें’ का पाठ पढ़ाते हैं। काक-वाणी का मानना है कि जल्द ही सरकार इन कॉकरोचों को स्कूलों का हेडमास्टर नियुक्त कर देगी। ये न तो वेतन मांगेंगे, न ही छुट्टी लेंगे और न ही पुरानी पेंशन के लिए धरना देंगे। बजट की जो बचत होगी, उससे नेताओं के चुनावी विज्ञापनों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए जा सकेंगे। ‘कॉकरोच क्रांति’ जिंदाबाद!
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